Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
विहरन्कुपितस्तत्र लब्धमाहृत्य सुन्दरम् ।
लोकपालपुरीं दग्ध्वा जगामात्मीयमालयम् ॥ २९ ॥
एवं दृढतरीभूते द्वेषे दानवदेवयोः ।
देवाः स्वर्गं परित्यज्य दिक्षु जग्मुरदर्शनम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
करुद्ध
हुए शम्बरासुर ने वहाँ पर इधर-उधर भ्रमण किया, जो रत्न आदि सुन्दर वस्तुएँ थी, उन्हे हर कर और
लोकपालों की नगरी को जलाकर वह अपने स्थान को चला गया