Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 25–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 25,26
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मुक्तिरेषोच्यते राम ब्रह्मैतत्समुदाहृतम् ।
निर्वाणमेतत्कथितं श्रृणु तत्प्राप्यते कथम् ॥ २५ ॥
यदिदं दृश्यते दृश्यमहन्त्वन्तादिसंयुतम् ।
सतोऽप्यस्यात्यनुत्पत्त्या बुद्धयैतदवाप्यते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यों उत्कण्ठित हुए श्रीरामचन्द्रजी को मुक्तिप्राप्ति के उपाय के
उपदेश द्वारा धीरज देते हुए श्रीवसिष्ठजी बोले : श्रीरामचन्द्रजी, यह मुक्ति कही जाती है, इसे
ब्रह्म कहते हैं तथा यह निर्वाण कहा जाता है, वह कैसे प्राप्त होता है, इसको मैं कहता हूँ आप
सुनिए । वत्स, तुम, मैं, वह, यह इत्यादि भावों से युक्त जो यह दृश्य दिखाई देता है, वह यद्यपि
सत्-रूप से प्रतीत होता है, तथापि वन्ध्यापुत्र के तुल्य उसकी अत्यन्त अनुत्पत्ति के ज्ञानसे,
यह मुक्ति प्राप्त होती है