Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तच्चित्तास्तद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च तन्नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ १ ॥
तेषां ज्ञानैकनिष्ठानामात्मज्ञानविचारिणाम् ।
सा जीवन्मुक्ततोदेति विदेहान्मुक्ततैव या ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मविचार भी जब तक आत्मज्ञान न हो जाय, तब तक निरन्तर एकाग्र मन से करना
चाहिए । कदाचित् मास दो मास में कर लिया या नित्य करने पर भी बीच-बीचमे अन्यान्य
व्यापार करते रहे, इस प्रकार नहीं करना चाहिए, क्योकि “आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष
ब्रह्मविदां वरिष्ठः“ (जो आत्मा में ही क्रीडा करनेवाला, आत्मा मे ही रमण करनेवाला, ध्यान,
वैराग्य आदि क्रियावाला है, वह ब्रह्मज्ञानियोमे श्रेष्ठ है) (बह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति“ (आत्मनिष्ठ
मोक्ष को प्राप्त होता है) ऐसी श्रुति है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी बोले :
हे रामजी, जिनका चित्त निरन्तर आत्मा में ही लगा है और आत्मा की प्राप्ति में ही जिनका
जीवनव्यापार है, जो नित्य परस्पर आत्माका ही बोध कराते हुए प्रसन्न होते हैं और उसके
विषयमे वार्तालाप करते हुए आनन्दमग्न होते हैँ । केवल ज्ञानसाधन श्रवण, मनन आदिमे ही
जिनकी एकतानता हे ओर जो सदा आत्मज्ञानका ही विचार करते हैं, उन महात्माओं की वह
जीवन्मुक्ति उदित होती है, जो देह छुटने से शुद्ध मुक्ति ही है, अन्य नहीं हे
सर्ग सन्दर्भ
आठवाँ सर्ग समाप्त नौवाँ सर्ग जीवन्मुक्ति के लक्षण तथा सर्वात्मिताका वर्णन ओर जगत् का प्रलय होने पर अवशिष्ट आत्मस्वरूपका प्रतिपादन |