Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 87
छियासीवाँ सर्ग समाप्त सत्तायीवों सर्ग मन से ब्रह्मा बने हुए उन लोगों की देह के राक्षसा द्रारा भक्षण करनेपर उनकी संहार ओर सर्ग में वैसी ही स्थिति रही, यह वर्णन ।
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- Verses 1–2श्रीसूर्य ने कहा : हे पितामह, तदनन्तर वे एेन्दव ब्राह्मण उस उपासनाक्रममें बहुत भावना करने…
- Verse 3वन में रहनेवाले मांसभक्षी पशु-पक्षियोंने, जैसे बन्दर सुन्दर फलों को खाते हैं वैसे ही, इधर…
- Verse 4तदनन्तर वे एेन्दव ब्राह्मण, जिन्होंने अपनी ब्रह्मता में यानी मं ब्रह्मा हूँ” ऐसी भावना कर…
- Verses 5–6कल्पित ब्रह्माण्ड में सृष्टि आदि में व्यग्र होकर स्थित रहे
- Verse 7तदनन्तर हे विभो, जब आप रात्रि के अतिक्रमण की प्रतीक्षा कर रहे थे और सम्पूर्ण स्थिति का सं…
- Verse 8आज जब आप प्रलयरूप रात्रि से जागे ओर आपने संसार की सृष्टि करने की इच्छा की, उस समय भी वे उ…
- Verse 9हे भगवन्, इस प्रकार ये दस ऐन्दव ब्राह्मण दस ब्रह्मा हो गये । उन दसो के मनोरूप आकाशमें ये…
- Verse 10इतने ग्रन्थ से कथमिदं जातम्“ (कैसे यह उत्पन्न हुआ) इस प्रश्न का उत्तर देकर "कर्त्वम् (त…
- Verse 11हे ब्रह्मन्, यह दस ब्रह्माओं की सृष्टि मैंने आपसे कही और आकाश में दस ब्रह्माओं की उत्पत्…
- Verse 12यदि कोई कहे विरोध क्यों नहीं है ? इस पर केवल मन की कल्पना होने से उनका सर्ग असत्य ही है,…