Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
संपन्नैषा हरिणनयना चन्द्रबिम्बाननश्रीर्मानोन्नद्धा दयितललिता कान्तमाभोक्तुकामा ।
पूर्वस्मृत्या सरभसमुखी संयुता मण्डलान्तः स्वप्नान्ते वाऽप्रकृतिविभवा पद्मिनी चोदितेव ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
चन्द्रमण्डल के सदश मुखकान्तिवाली ओर मृग के तुल्य विशाल नेत्रवाली
यह लीला, जिसकी सूर्य की किरणों से कमलिनी की नाई वासनारूपी कलियाँ खिल गई थी,
जो लावण्यमयी होने के कारण स्वयं पति के लिए उपभोग की वस्तु थी ओर स्वयं भी सुन्दर
पति का उपभोग करना चाहती थी, भावनावश पूर्वदेहकी स्मृति से, स्वप्न में जैसे,
पद्मब्रह्माण्डमण्डल के भीतर जाकर पति से संयुक्त हो गई