Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verses 41–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, verses 41–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 41-45
संस्कृत श्लोक
मर्मच्छेदशराघातव्यथाविदितदुष्कृति ।
कबन्धबन्धप्रारब्धवेतालवदनाक्रमम् ॥ ४१ ॥
उह्यमानध्वजच्छत्रचारुचामरपङ्कजम् ।
किरत्संध्यारुणं दिक्षु तेजस्कं रक्तपङ्कजम् ॥ ४२ ॥
रथचक्रधरावर्तं रक्तार्णवमिवाष्टमम् ।
पताकाफेनपुञ्जाढ्यं चारुचामरबुद्बुदम् ॥ ४३ ॥
विपर्यस्तरथं भूमिपङ्कमग्नपुरोपमम् ।
उत्पातवातनिर्धूतद्रुमं वनमिवाततम् ॥ ४४ ॥
कल्पदग्धजगत्प्रख्यं मुनिपीतार्णवोपमम् ।
अतिवृष्टिहतं देशमिव प्रोज्झितमानवम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर सैकड़ों रूघिर-नदियाँ बह रही थी, उनमें केश
ही सेवाल थे, मुख ही कमल थे, चक्र ही आवर्तं थे । रक्त के महानद बह रहे थे जो ऊपर तैर
रही बड़ी-बड़ी तरंगों से पूर्ण थे, अधमरे मनुष्य शरीर मेँ लगे हुए हथियारों को निकालने में
व्यग्र थे, विदेशमें मरे हुए लोगों के अंगभूषण, हाथी ओर घोडे शोक से रोदनपूर्वक दिये गये थे ।
वहाँ पर लोग मरते समय पुत्र, इष्ट मित्र, माता, देवता और परमेश्वर का स्मरण करते, "हाहा
ही ही" आदि कराहना मर्मपीडा को सूचित करता था, पराक्रम दशयि बिना ही मर रहे दुर्भाग्य
&3 पेट की बाई ओर स्थित एक मांस की ग्रन्थि पिण्डभार्या कही जाती है ।
से आक्रान्त कितने ही शूरवीर अपने भाग्य को कोस रहे थे, हाथियों के साथ युद्ध करने में
असमर्थ हाथियों के आगे स्थित मृतप्राय शरीरवाले योद्धा कहीं कुचल न जायें, इस भय से
देवताओं की प्रार्थना करते थे ॥ ३ ६- ३ ९॥ मर रहे योद्धाओं पर अशुर लोगों ने पादाघातादिरूप
महती अवज्ञा से जो अपराध किया, उससे वे भाग रहे थे, अतएव वे रुधिर के आवर्तों से युक्त
होने के कारण भीषणतम स्थानों में भी बिना किसी हिचक के जाने को तैयार थे ॥ ४ ०॥ मर्मच्छेद
करनेवाले बाणों के प्रहार से उत्पन्न पीड़ा से जन्मान्तरों की पापराशि का अनुमान होता था,
भाग रहे कबन्धों को बाँधकर वेतालों ने रुधिरपान के लिए अपने मुखों को प्रवृत्त किया था,
रुधिर के बड़े-बड़े तालाबों में तैर रहे छत्र, ध्वज और सुन्दर चँवर ही वहाँ पर कमल थे, रक्त
के तालाबों में संध्याकाल की लालिमा के प्रतिबिम्बित होने पर लाल तेजसमूह रूप रक्त
कमल को वह (समरभूमि) चारों ओर बिखेर रही थी । वह रणभूमि क्या थी, आठवाँ रुधिरपूर्ण
समुद्र था, रथ ओर रथों के पहिए उसमें क्रमशः पर्वत ओर आवर्तं थे, पताकारूपी फेन-समूह
से वह युक्त था, सुन्दर चँवर ही उसमें बुद्बुद थे । उसमें रथ औंधे गिरे हुए थे, अतएव वह
भूमिके कीचड़ में धसे हुए नगर के तुल्य प्रतीत होता था, जिसमें उत्पात वायुसे (भीषण अन्धड़
से) वृक्ष तोडे-मरोडे गये हों ऐसे घने वन के समान, प्रलयकाल में जले हुए जगत् के सदश
ओर महामुनि श्रीअगस्त्यजी द्वारा पिये गये समुद्र के समान लगता था, अतिवृष्टि से उजड़े हुए
देश के तुल्य उससे मनुष्य हट गये थे