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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verses 25–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, verses 25–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 25-35

संस्कृत श्लोक

मौलिहाराङ्गदद्योतशक्रचापवनावृतम् । श्वशृगालकराकृष्टसान्द्रान्त्रादीर्घरज्जुकम् ॥ २५ ॥ रक्तक्षेत्रक्वणत्किंचिच्छेषजीवनृदन्तुरम् । रक्तकर्दमनिर्मग्नसजीवनरदर्दुरम् ॥ २६ ॥ वराङ्गकवचप्रख्यनिर्गताक्षिशतोच्चयम् । वहद्भुजोरुकाष्ठौघघोररक्तसरिच्छतम् ॥ २७ ॥ साक्रन्दवन्धुवलितं मृतार्धमृतमानवम् । शरायुधरथाश्वेभपर्याणासंवरान्तरम् ॥ २८ ॥ नृत्यत्कबन्धदोर्दण्डमण्डलानमिताम्बरम् । मदमेदोवसागन्धपीडार्द्रघ्राणकोटरम् ॥ २९ ॥ उत्ताल्वर्धमृतेभाश्ववार्यमाणाल्पजीवितम् । वहद्रक्तनदीवीचिप्रहारहतदुन्दुभि ॥ ३० ॥ उह्यमानमृतेभाश्वमकरासृक्सरिच्छतम् । म्रियमाणनरानीकफूत्कृतासृक्प्रणालिकम् ॥ ३१ ॥ स्वल्पजीवशरापूर्णमुखदृक्कान्तितस्वनम् । पिण्डभार्यावसागन्धवातान्तोत्पीठलोहितम् ॥ ३२ ॥ उन्नासार्धमृतेभेन्द्रकराक्रान्तकबन्धकम् । निरधिष्ठितहस्त्यश्वपातितोच्चकबन्धकम् ॥ ३३ ॥ रुदत्क्रन्दत्परिभ्रष्टशवक्षुब्धासृगुद्धति । मृतभर्तृगले शस्त्रत्यक्तप्राणकुलाङ्गनम् ॥ ३४ ॥ सेनोत्क्रान्तततक्षिप्रबहुपान्थपरीक्षणम् । शवहारकराकृष्टसप्राणानुचराकुलम् ॥ ३५ ॥ केशशैवालवक्राब्जचक्रावर्तनदीशतम् । तरत्तुङ्गतरङ्गाढ्यवहद्रक्तमहानदम् ॥ ३६ ॥ अङ्गलग्नायुधोद्धारव्यग्रार्धमृतमानवम् । विदेशमृतसाक्रन्दहुताङ्गगजवाजिनम् ॥ ३७ ॥ प्राणान्तस्मृतपुत्रेष्टमातृदेवपराभिधम् । हाहाहीहीतिकथितमर्मच्छेदनवेदनम् ॥ ३८ ॥ म्रियमाणमथौजिष्ठद्विष्टप्रारब्धसंचयम् । दन्तियुद्धासमर्थाग्रमृतदेहेष्टदैवतम् ॥ ३९ ॥ म्रियमाणमहावज्ञाशूराश्रितपलायनम् । अशङ्कितासृगावर्तभीमास्पदगमोत्सुकम् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

सिर पर धारण किये हुए शिरोरत्नं ओर अंगदों (बाजू-बन्दों )की जगमगाहट से सैकड़ों इन्द्रधनुष उसके चारों ओर उगे थे, कुत्ते ओर सियार अपने पंजों से खून से लथपथ अँतड़ीरूपी लम्बी रस्सी को खींच रहे थे, जिनका जीवन कुछ कुछ शेष है, ऐसे दाँतों से चिरे हुए पुरुष वहाँ पर रुधिर से परिपूर्ण खेत में घर्‌ घर्‌ शब्द कर रहे थे, सजीव नररूपी मेंढक रुधिरके कीचड़ में सर्वथा निमग्न थे, चित्रकचुक के सदृश सैंकड़ों आँखों के समूह वहाँ पर निकले हुए पड़े थे, वहाँ पर सैकड़ों रक्तनदियाँ बह रही थी जो भुजा ओर जंघा रूपी काष्ठ समूह से बड़ी भीषण थी, रो रहे बन्धुओं से सारी रणभूमि व्याप्त थी, जहाँ देखो वहीं मरे ओर अधमरे मनुष्यों का ढेर लगा था, बाण, अस्त्र-शस्त्र, रथ, घोडे, हाथी और काठियों से सारी रणभूमि आच्छन्न थी, वहाँ नाच रहे कबन्धोँके बाहुदण्डमण्डल से आकाशमण्डल नीचा किया गया था, हाथियों के मद, मेदा ओर वसा की गन्ध से नाक में पीडा होती थी ओर नाक बहने लगती थी, जिन्होंने अपने तालू (जबड़े) ऊपर को किये थे ऐसे अधमरे हाथी ओर घोड़ों से अपने अल्पजीवित की रक्षा की जा रही थी, बह रही रुधिर नदी की लहरों के हार से नगाडे बज रहे थे, मरे हुए हाथी एवं घोडे रूपी मगर खून की सैकड़ों नदियों में ऊपर तैर रहे थे, वहाँ पर मर रहे नरों के फूत्कार से मुखमें भरे हुए खून के फव्वारे बाहर निकाले जा रहे थे, जिनका जीवन थोड़ा शेष है और मुँह ओर नेत्रो में बाण भरे हुए हैं, ऐसे लोग वहाँ पर रो चिल्ला रहे थे वहाँ पर खून पिण्डभार्या के (८) वसा की दुर्गन्धि से युक्त और वायु लगने से धनीभूत हुआ था, ऊपर की ओर सूंड किये हुए अधमरे गजराजो की सूं से कबन्ध आक्रान्त थे, सवारों के मर जाने के कारण अनियन्त्रित (नियन्त्रणरहित) हाथी, घोडों ने ऊँचे-ऊँचे कबन्धो को गिरा दिया था, रो रहे, चिल्ला रहे और गिर रहे शवों से खूब खून उछल रहा था, मरे हुए पति के गले मेँ आलिंगन करके स्थित कुलांगना ओं ने देवात्‌ प्राप्त शस्त्रघात से प्राण त्याग किया था, अग्निसंरकार आदि के योग्य शवों के लाने के लिए स्वामी का आदेश पाकर शिविरों में प्रविष्ट सेना में से गये हुए रणभूमि में अलग-अलग प्रवेश करने में भयभीत होने के कारण इकडे हुए बड़ी जल्दी से कार्य कर रहे बहुत से बटोहियों ने अपने- अपने आत्मीयो के शवों को वहाँ पर पहचाना । शवों को ले जाने-वाले लोगों की स्वभीष्टशवान्वेषणत्वरा से सारी रणभूमि, जिन्होंने अपने हाथों से सजीव लोगों को खींचा है ऐसे सेवकों से, व्याप्त थी