Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
रथेषु ध्वस्तचक्रेषु निखातेऽमुत्र मूर्धसु ।
निपेतुर्जनसंघाता मेघा इव वनाद्रिषु ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें से अर्द्धचक्राकार बाणों के समूह आदि प्रबल हथियाररूप वायु से जिनके
शरीर कम्पित हो गये थे, वे भँवरों के दल से सुशोभित मेघों की नाई घूमते थे ॥ ४ ५॥ बाणरूपी
मूसलाधार वृष्टि की धाराओं को धारण करनेवाले मेघों के तुल्य, बाण समूहरूपी ऊन से
परिपूर्ण भेडों के सदुश, बाणव्यूहरूपी अतएव गर्जनकारी हाथी घूमते थे । कन्दाक स्थल के
मनुष्य, हाथी आदि प्राणी वनराज्य नामक देशके वीरों से ऐसे निर्बल कर दिये गये कि केवल
खिंचनेमात्र से धागे के समान टूट गये । जन्तु खूब जोर से खींचे गये कच्चे सूत की नाईं टूट
गये, छिन्न-भिन्न हो गये ॥४ ६-४ ७॥ खाईरूपी गड्ढे में टकराने से रथों के चक्रों के टूटने पर
इन रथों के मस्तकों पर प्रहार करनेवाले शत्रुओं के समूह ऐसे टूटे जैसे वनपूर्ण पर्वतों पर मेघ
गिरते हैं