Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 42–47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, verses 42–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 42-44
संस्कृत श्लोक
चेदयश्चेतनां जह्रुस्तङ्गणानां रणाङ्गणे ।
पुष्पाणां पथि शीर्णानां सौकुमार्यमिवातपाः ॥ ४२ ॥
कौसलाः पौरवारावमसहन्तोऽन्तका इव ।
तैरुन्मुक्तगदाप्रासशरशक्त्यतिवृष्टयः ॥ ४३ ॥
बभूवुर्भल्लकृत्ताङ्गाऽविस्मया विद्रुमद्रुमाः ।
इवाद्रौ विद्रवन्त्यार्द्रसान्द्रासृक्सूर्यमूर्तयः ॥ ४४ ॥
नाराचौघमहाहेतिमारुताधूतमूर्तयः ।
बभ्रमुर्भ्रमरानीकभासुरा जलदा इव ॥ ४५ ॥
शरधाराधरा मेघाः शरोर्णापूर्णमेषकाः ।
शरपत्रावृता वृक्षा भ्रमुस्तद्गर्जनागजाः ॥ ४६ ॥
वनराज्यजराजीर्णाः कन्दाकस्थलजन्तवः ।
अत्रुटन्परमाकृष्टाः पेलवा इव तन्तवः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
समरभूमि में चेदिदेशीय वीरों ने जैसे मार्ग में गिरे हुए फूलों की सुकुमारता को धूप हर लेती है
वैसे ही तंगणदेश के योद्धाओं की चेतना को हर लिया यानी उन्हे निष्प्राण बना दिया । पौरवदेश
के योद्धाओं के शब्दको भी सहन न करनेवाले और उन्हें यमराज की नाई पीट रहे
कोसलदेशवासियों पर पौरवों ने गदाओं, भाले, बाणों, शक्तियों की अतिवृष्टि की । उनमें से
जो भालों से अंगों के कटने पर भी शत्रुओं के शौर्य के विषय में किसी प्रकार के विस्मय से रहित
अतएव गीले ओर गाढे रुधिर से बालसूर्य से हुए, वे पर्वत में मूँगे के वृक्षों की नाईं दौड़ते
थे