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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 22–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

कान्तकाञ्चनकान्तासीत्ताम्रसंग्रामवाहिनी । भुक्ता गौडभटेनाङ्ग नखकेशनिकर्षणैः ॥ २२ ॥ रणे नगनयासंख्यकवच्चक्रनिकृन्तनैः । तङ्गणाः कणशः कीर्णाः कङ्कगृध्रेषुभासकैः ॥ २३ ॥ लगुडालोडनोड्डीनं गौडं गुडुगुडारवम् । श्रुत्वा गान्धारगावोऽग्रे दुद्रुवुर्द्रविडा इव ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

वत्स श्रीराम, ताम्रों (एक प्रकारके यवनों ) की संग्राम के लिए तत्पर सेनारूपी कान्तकांचनप्रिया (जिसे पति ओर सुवर्ण प्रिय है) नायिका गौड़देश योद्धाओं द्वारा नखक्षत और भासकदेशवासियों ने रणभूमि में वृक्षों और पहाड़ों को तहस नहस कर देने २ यदि चन्द्र इवाऽऽदितयः सच्छिद्रों रश्मिमणडलः । कृष्णरक्तान्तपर्यन्तस्तज्जनक्षयलक्षणम्‌ ॥ यदि सूर्य चन्द्रमा की नाई हो, या किरणमण्डल में छेद दिखाई दे अथवा रवि मण्डल चारों ओर काला या लाल हो जाय, तो उसे मनुष्यों के विनाश का हेतु समझना चाहिए । वाले शब्दायमान असंख्य चक्रों के वारो से या चक्रो द्वारा छेदन से तंगणदेशवासियों को किनका- किनका बनाकर कंक (सफेद चील) ओर गीधों में बिखेर दिया | गौड़ सैनिकों के अस्पष्ट बोल के शब्द को, जो बड़ी-बड़ी लाठियों के भ्रमण से उपलक्षित था, सुनकर गोतुल्य गान्धरदेशवासी द्रविड की नाई भाग गये