Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 32, Verses 21–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 32, verses 21–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 21-28
संस्कृत श्लोक
चक्रव्यूहकराक्रान्तदुर्वृत्तसुरभासुरम् ।
गरुडव्यूहसंरम्भविद्रवन्नागसंचयम् ॥ २१ ॥
श्येनव्यूहविभिन्नाग्रसंनिवेशोत्तमध्वनि ।
अन्योन्यास्फोटनिःशेषप्रपतद्भूरिवृन्दकम् ॥ २२ ॥
विविधव्यूहविन्यासवान्तवीरवरारवम् ।
करप्रतोलनोल्लासमत्तमुद्गरमण्डलम् ॥ २३ ॥
कृष्णायुधांशुजलदश्यामीकृतदिवाकरम् ।
अनिलाधूतपल्यूलसूत्कृताभशरध्वनि ॥ २४ ॥
अनेककल्पकल्पाग्रसवृन्दमिव संस्थितम् ।
प्रलयानिलसंक्षुब्धमेकार्णवमिवोत्थितम् ॥ २५ ॥
सद्यश्छिन्नं महामेरोः पक्षद्वयमिव स्फुरत् ।
क्षुब्धमारुतनिर्धूतमिव कज्जलपर्वतम् ॥ २६ ॥
पातालकुहरात्क्षुब्धमन्धकारमिवोत्थितम् ।
लोकालोकमिवोन्मत्तनृत्यलोललसत्तटम् ।
महानरकसंघातं भित्त्वावनिमिवोत्थितम् ॥ २७ ॥
आलोलकुन्तमुसलासिपरश्वधांशुश्यामायमानदिवसातपवारिपूरैः ।
एकार्णवं भुवनकोशमिवाचिरेण कर्तुं समुद्यतमगाधमनन्तपूरैः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अब दोनों सेनाओं के प्रवेशमार्ग के भेद से विभिन्न व्यूहस्वना का वर्णन करते हैं।
कहीं पर चक्राकार व्यूह का निर्माण करनेवाले पुरुषों से, दूर्दान्त दैत्यों पर आक्रमण किये
हुए देवताओं की नाई, दोनों सेनाएँ दैदीप्यमान थीं, कहीं पर उनमें गरूड़व्यूह के निर्माण से
सर्पो के समूह (श्लेषवश हाथियों के झुण्ड) वेग के साथ भाग रहे थे, श्येन के व्यूह से प्रतिपक्षियों
का सेनाशिविर दो भागों मे विभक्त किया गया था, अतएव दोनों सेनाओं में गगनभेदी
कलकलशब्द हो रहा था, कहीं पर परस्पर बाहुओं में जोर की टक्कर लगने के कारण वेग से
सबके सब समूह भूमि में गिर रहे थे, कहीं पर व्यूहरचना से आगे निकले हुए वीरों के विविध
सुन्दर शब्द हो रहे थे, कहीं पर हाथों द्वारा उठाने से उत्पन्न हुए उल्लास से मत्त की नाई
मुद्गर नाच रहे थे, कहीं पर काले-काले शस्त्रास्त्रों की किरणों से मानों उत्पन्न हुए मेघों ने
सूर्य को तिरोहित कर दिया था, कहीं पर वायु द्वारा कँपाये गये पल्यूलों के (एक प्रकार की घास
के) सूत्कार के (वायु के संघर्ष से उत्पन्न सूत् इत्याकरक शब्द के) समान बाणों की ध्वनि हो
रही थी, प्रलय करने में समर्थ अनेक पुष्करावर्त आदि मेघों से मानों दोनों सेनाएँ अग्रभाग में
संघीभूत होकर स्थित थी, वे दोनों सेनाएँ प्रलय के वायु के विक्षुब्ध एकमात्र सागर के समान
उदित हुई थी, तुरन्त कटे हुए, अतएव फड़फड़ाते हुए महामेरु के दो परों के समान थी,
अत्यन्त शोभायुक्त वायु से कँपाये गये चचंल पर्वत के समान थी, पातालरूपी गर्त से निकले
हुए क्षुब्ध अन्धकार की नाईं थी, पर्वत के समान थी, पातालरूपी गर्त से निकले हुए क्षुब्ध
अन्धकार की नाई थी, उन्मत्त नृत्य से चंचल और देदीप्यमान तटवाले लोकालोक पर्वत की
नाई थी ओर पृथिवी को तोड़कर उदित हुए महानरकों के संघात की नाई थी। मानों वे दोनों
सेनाएँ चंचल बर्छे, मूसल, तलवार और कुल्हाड़ों के किरणों से काले से प्रतीत हो रहे
सूर्यप्रकाशरूपी जल के प्रवाह से सम्पूर्ण भूवनकोष को एकमात्र अगाध सागर बनाने के लिए
उद्यत थी