Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 32, Verses 1–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 32, verses 1–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 1-19
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ वीरवरोत्कण्ठनृत्यदप्सरसि स्थिता ।
लीलावलोकयामास व्योम्नि विद्यान्वितावनौ ॥ १ ॥
स्वराष्ट्रमण्डले भर्तृपालिते बलमालिते ।
कस्मिंश्चिद्विततारण्ये द्वितीयाकाशभीषणे ॥ २ ॥
सेनाद्वितयमाक्षुब्धं सौम्याब्धिद्वितयोपमम् ।
महारम्भघनं मत्तं स्थितं राजद्वयान्वितम् ॥ ३ ॥
युद्धसज्जं सुसंनद्धमिद्धमग्निमिवाद्भुतम् ।
पूर्वप्रहारसंपातप्रेक्षाक्षुब्धाक्षिलक्षितम् ॥ ४ ॥
उद्यतामलनिस्त्रिंशधारासारवहज्जनम् ।
कचत्परश्वधप्रासभिन्दिपालर्ष्टिमुद्गरम् ॥ ५ ॥
गरुत्मत्पक्षविक्षुब्धवनसंपातकम्पितम् ।
उद्यद्दिनकरालोकचञ्चत्कनककङ्कटम् ॥ ६ ॥
परस्परमुखालोककोपप्रोद्दामितायुधम् ।
अन्योन्यबद्धदृष्टित्वाच्चित्रं भित्ताविवार्पितम् ॥ ७ ॥
लेखामर्यादया दीर्घबद्धया स्थापितस्थिति ।
अनिवार्यमहासैन्यझांकाराश्रुतसंकथम् ॥ ८ ॥
पूर्वप्रहारस्मयतश्चिरं संशान्तदुन्दुभि ।
निबद्धयोधसंस्थाननिखिलानीकमन्थरम् ॥ ९ ॥
धनुर्द्वितथमात्रात्मशून्यमध्यैकसेतुना ।
विभक्तं कल्पवातेन मत्तमेकार्णवं यथा ॥ १० ॥
काये संकटसंरम्भचिन्तापरवशेश्वरम् ।
विरटद्भेककण्ठत्वग्भङ्गुरातुरहृद्गुहम् ॥ ११ ॥
प्राणसर्वस्वसंत्यागसोद्योगासंख्यसैनिकम् ।
कर्णाकृष्टशरौघौघत्यागोन्मुखधनुर्धरम् ॥ १२ ॥
प्रहारपातसंप्रेक्षानिष्पन्दासंख्यसैनिकम् ।
अन्योन्योत्कण्ठकाठिन्यभरभ्रुकुटिसंकटम् ॥ १३ ॥
परस्परसुसंघट्टकटुटङ्कारकङ्कटम् ।
वीरयोधमुखादग्धभीरुप्रेप्सितकोटरम् ॥ १४ ॥
मिथःसंस्थानकालोकमात्रासंदिग्धजीवितम् ।
समस्ताङ्गरुहासक्तप्रांशुवृद्धेभमानवम् ॥ १५ ॥
पूर्वप्रहारसंप्रेक्षाव्यग्रप्राणतया तया ।
संशान्तकल्लोलरवं निद्रामुद्रपुरोपमम् ॥ १६ ॥
संशान्तशङ्खसंघाततूर्यनिर्ह्राददुन्दुभि ।
भूतलाकाशसंलीनसर्वपांसुपयोधरम् ॥ १७ ॥
पलायनपरैः पश्चात्त्यक्तमङ्गुलमण्डलम् ।
विसारिमकरव्यूहमत्स्यसंख्याब्धिभासुरम् ॥ १८ ॥
पताकामञ्जरीपुञ्जविजिताकाशतारकम् ।
हास्तिकोत्तम्भितकरकाननीकृतखान्तरम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
का आवास होने के कारण दूसरे आकाश की नाई किसी विशाल वन में दो महासागरं के तुल्य
परस्पर सब प्रकार से क्षुब्ध दो सेनाओं को देखा । वे मत्त सेनाएँ महान् कार्योद्योगों से युक्त थी,
दोनों पक्षों के दो राजा उनमें विद्यमान थे, युद्धके लिए वे सुसज्जित थी, कवच, सिरस्त्राण,
हरवा हथियार से लैस थी, अतः देदीप्यमान अग्नि की नाई वे बड़ी अद्भुत प्रतीत होती थी,
पहले प्रहार-पात को देखने के लिए क्षुब्ध असंख्य नेत्र उन्हें देख रहे थे, दोनों सेनाओं में प्रहार
के लिए उठाई गई चमचमाती हुई तलवार धाराएँ ही मानों जलधाराएँ ठहरी उन्हें लोग सह रहे
थे, कुल्हाडे, वर्छे, बन्दूक, तोप ओर मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र चमचमा रहे थे, गरुड के परों
से विक्षुब्ध वन संघात के समान दोनों सेनाएँ चंचल थीं, उनमें उदयकाल के सूर्य के सुनहले
आलोक (प्रकाश) के समान सोने के कवच दैदीप्यमान हो रहे थे, योद्धा ओर प्रतियोद्धा द्वारा
एक दूसरे के मुखदर्शन से उत्पन्न हुए कोप से परस्पर अस्त्र-शस्त्र उठाये गये थे, योद्धा ओर
प्रतियोद्धा एक दूसरे के ऊपर टकटकी लगाकर देखने के कारण भीत में लिखे गये चित्र से
मालूम होते थे, खूब लम्बी खींची हुई दो सेनाओं के बीच की रेखा रूपी मर्यादा से (सीमा से)
दोनों सेनाओं की स्थिति नियत कर दी गई थी, बड़ी भारी दो सेनाओं में एकत्रित योद्धाओं के
अनिवार्य हल्ले-गुल्ले के कारण लोगों कँ परस्पर आलाप नहीं सुनाई देता था, राजा की
आज्ञा के विना पहले वार न हो, इस शंका के कारण बहुत देरी तक दोनों सेनाओं में रणदुन्दुभी
शान्त था, प्रायः अपने-अपने स्थान में श्रेणीवद्ध योद्धारूपी प्रधान अवयववाली सम्पूर्ण सहायक
सेनाओं से दोनों सेनाएँ परिपूर्ण थीं, जैसे प्रलयकाल के महावायु से विक्षुब्ध एकमात्र समुद्र दो
विभागों मे विभक्त होता है, वैसे ही वे दोनों सेनाएँ केवल दो धनुष परिमाण के जनशून्य
मध्यभागरूपी एक पुल से विभक्त थीं, उसमें दोनों पक्षों के राजा अपने शरीर पर वेग से
उपस्थित हुए संकट की चिन्ता से ग्रस्त थे, दोनों सेनाओं में डरपोक लोगों की हृदयरूपी गुफा
बोल रहे मेढक के कण्ठ की त्वचा की नाई फरफरा रही थी, दोनों पक्षो मे असंख्य सेनिक
प्राणरूपी सर्वस्व का त्याग करने के लिए उद्यत थे, कान तक खीचे गये बाण समूहरूपी प्रवाह
को छोड़ने के लिए धनुधरी तत्पर थे, प्रहार करने की आज्ञा की प्रतीक्षा मेँ असंख्य सेनिक
चित्रवत् निश्चल खड़े थे, परस्पर योद्धा ओर प्रतियोद्धा में युद्ध की उत्कण्ठा से उत्पन्न अतिशय
क्रोध से बँधी हुई भ्रुकुटियों से दोनों सेनाएँ दुष्प्रेक्ष्य हो गई थीं, योद्धा ओर प्रतियोद्धा के परस्पर
अभिघात से कवचों की कर्णकटु टंकार ध्वनि हो रही थी, वीर योद्धाओं की मुखाग्नि से जले
हुए से अतएव काले मुखवाले डरपोक लोग छिपने के लिए पहाड़ों की खोह ढूँढ़ रहे थे, परस्पर
युद्ध के दर्शन पर्यन्त जिनका जीवन निश्चित था, दोनों पक्षों में हाथी और मनुष्य खड़े हुए
रोंगटों से व्याप्त होने के कारण ऊपर की ओर ऊँचे और अगल-बगल बढ़े हुए थे, प्रथम प्रहार
की आज्ञा की प्रतीक्षा में व्यग्र चित्त होने से दोनों सेनाओं में कोलाहलका शब्द शान्त था,
अतएव वे जिसके नरनारी गाढ नींद में सोये हैं, ऐसे नगर के तुल्य प्रतीत होती थीं, शंखों,
तुरहियों और दुन्दुभियों का शब्द शान्त था, सब धूलिकण और बादल क्रमशः भूमितल और
आकाश में लीन थे, भागने में तत्पर डरपोक लोगों ने सेना के अलंकाररूपी शूरवीरों को पीछे
छोड़ दिया था, बड़े-बड़े मगरों का और मछलियों का जिसमें युद्ध हो रहा हो, ऐसे सागर की
नाईं उस सेनाओं की छवि छिटक रही थी, पताकाओं में लगी हुई चमकदार झालरों ने आकाश
के तारों को जीत लिया था, झुण्ड के झुण्ड हाथियों द्वारा ऊपर उठाई गई सूँड़ों ने आकाश के
मध्यको वन बना डाला था