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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

यत्र यत्र हतः शूरः स्वर्ग इत्यवशोक्तयः । धर्मे योद्धा भवेच्छूर इत्येवं शास्त्रनिश्चयः ॥ ३३ ॥ सदाचारवतामर्थे खड्गधारां सहन्ति ये । ते शूरा इति कथ्यन्ते शेषा डिम्भाहवाहताः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

धार्मिक स्वामी का आश्रित होने पर भी यदि अधर्मा से युद्ध करता हुआ योद्धा मारा जाय, तो उसको स्वर्ग प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहते हैं। यदि धर्मपूर्वक युद्ध हो, तो युद्ध में मृत योद्धा की स्वर्ग में स्थिति होती हे । यदि अधर्म्य युद्ध से मारे गये पुरुष को स्वर्ग प्राप्त हो, तब तो मत्त पुरुष परलोक के भय से रहित होकर अत्यन्त अधर्म्य युद्ध से भी दूसरे लोगों को नष्ट कर डालें ॥ ३ २॥ यदि ऐसी बात है, तो “परप्राणान्‌ निजप्राणैः पणीकृत्योद्यतायुध: । यत्र यत्र हतः शूरः स्वर्गस्तत्र पदे पदे ॥ (अपने प्राणोंसे दूसरे के प्राणो की बाजी लगाकर शस्त्र को उठाकर शूर जहाँ जहाँ भी मारा जाय वहाँ उसे पद पद पर स्वर्ग है) इत्यादि साधारण लोकप्रवादो की क्या गति होगी 2 इस पर कहते है । शूर जहाँ-जहाँ पर भी मारा जाय, वहाँ उसे पद पद पर स्वर्ग है” इत्यादि अवश लोगों की उक्तियाँ हैं, किन्तु धर्म के लिए युद्ध करनेवाला पुरुष शूर है, शास्त्र का तो यही निश्चय है