Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यथासंभवशास्त्रार्थलोकाचारानुवृत्तिमान् ।
युध्यते तादृशश्चैव भक्तः शूरः स उच्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो
यथासंभव शास्त्रप्रतिपादित विधि के अनुकूल और लोकाचार के अनुकूल आचरण करनेवाला
होकर रण में युद्ध करता है ओर वैसे ही सदाचारी स्वामी का भक्त हो, वह शूर कहलाता
हे