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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 24

तेईसवाँ सर्ग समाप्त २ इस विषय में दो मत हैं एक मत यह है कि योगी लोग समाधि द्वारा स्थूल देह से बाहर निकल कर सूक्ष्म देह से बाहर पर्यटन करते हैं दूसरा मत यह कि योगी लोग देह से बाहर नहीं निकलते, मात्र स्थूल देह के अभिमान का परित्याग कर और हृदय से लेकर कंठ तक बिलस्तभर नाड़ी में स्थित होकर या आरोहण कर सर्वव्यापी ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं उसी ज्ञान से वे लोग स्वर्ग, मृत्यु, पाताल आदि लोकों का दर्शन करते हैं ।

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  1. Verses 1–3चौबीसवाँ सर्ग जा रही ज्ञप्ति देवी ओर लीला का असीम विश्व के वैचित्र्य के विलासों से परिपूर…
  2. Verses 4–6चन्द्रमा के मध्य के सदृश उज्ज्वल उन दोनों ने दिशाओमें सुमेरु आदि पर्वतोके शिखरो मेँ स्थित…
  3. Verse 7जैसे दो भँवरियाँ करोड़ों मृणालांकुरोंसे व्याप्त कमल के तालाबों में भ्रमण करती हैं, वैसे ह…
  4. Verses 8–64साथ उड रहे अतएव चंचल कोए, उल्लू, गीध, चातक आदि पक्षियों और नाच रही डाकिनियों (पिशाच योनि…
  5. Verse 65इस प्रकार आकाश का वर्णन करने पर लोगों को आकाशचारियों के वैभव में राग न हो, इसलिए उन्हें त…