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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 24, Verses 8–64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 24, verses 8–64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 8-64

संस्कृत श्लोक

धारागृहधिया धीरगङ्गानिर्झरधारिणि । भ्रेमतुर्वातविक्षुब्धमेघमण्डलमण्डपे ॥ ८ ॥ ततो मधुरगामिन्यौ विश्राम्यन्त्यौ स्वशक्तितः । शून्ये ददृशतुर्व्योम महारम्भातिमन्थरम् ॥ ९ ॥ अदृष्टपूर्वमन्योन्यं सर्वसंकटकोटरम् । अपूर्यमाणमाशून्यं जगत्कोटिशतैरपि ॥ १० ॥ उपर्युपर्युपर्युच्चैरन्यैरन्यैर्वृतं पृथक् । विचित्राभरणाकारैर्भूतलैः सुविमानकैः ॥ ११ ॥ परितः पूरितव्योम्नां मेर्वादिकुलभूभृताम् । पद्मरागतटोद्द्योतैः कल्पज्वालोपमोदरम् ॥ १२ ॥ मुक्ताशिखरभापूरैर्हिमवत्सानुसुन्दरम् । काञ्चनाद्रिस्थलार्चिर्भिः काञ्चनस्थलभासुरम् ॥ १३ ॥ महामरकताभाभिः शाद्वलस्थलनीलिमम् । द्रष्टृदृश्यक्षयासक्तजातध्वान्तोत्थकालिमम् ॥ १४ ॥ पारिजातलतालोलविमानगणकेतनम् । अतो मञ्जरिकाकारमिव वैदूर्यभूतलम् ॥ १५ ॥ मनोवेगमहासिद्धजितवातगमागमम् । विमानगृहदेवस्त्रीगेयवाद्यसघुंघुमम् ॥ १६ ॥ त्रैलोक्यवरभूतौघसंचाराविरलान्तरम् । अन्योन्यादृष्टसंचारसुरासुरकुलाकुलम् ॥ १७ ॥ पर्यन्तस्थितकूष्माण्डरक्षःपैशाचमण्डलम् । वातस्कन्धमहावेगवहद्वैमानिकव्रजम् ॥ १८ ॥ वहद्विमानसीत्कारमुष्टिग्राह्यघनध्वनि । ग्रहर्क्षघनसंचारात्प्रचलद्वातयन्त्रकम् ॥ १९ ॥ निकटातपदग्धाल्पसिद्धसिद्धोज्झितास्पदम् । अर्काश्वमुखवातास्तदग्धमुग्धविमानकम् ॥ २० ॥ लोकपालाप्सरोवृन्दसंचाराचारचञ्चलम । देव्यन्तःपुरिकादग्धधूपधूमाम्बुदाम्बरम् ॥ २१ ॥ स्वस्वर्गाहूतदेवस्त्रीस्वाङ्गविभ्रष्टभूषणम् । सामान्यसिद्धसङ्घोग्रतेजःपुञ्जतमोबलम् ॥ २२ ॥ वलवत्सिद्धसंघट्टगमागमविघट्टितैः । घनैः सांशुकपार्श्वस्थहिमवन्मेरुमन्दरम् ॥ २३ ॥ काकोलूकैर्गृध्रभासै राशिभूतैश्चलैर्वृतम् । नृत्यद्भिर्डाकिनीसङ्घैस्तरङ्गैरिव वारिधिम् ॥ २४ ॥ प्रवृत्तैर्योगिनीसङ्घैः श्वकाकोष्ट्रखराननैः । निरर्थं योजनशतं गत्वागच्छद्भिरावृतम् ॥ २५ ॥ लोकपालपुरोध्वान्तधूमधूम्रेऽभ्रमन्दिरे । सिद्धगन्धर्वमिथुनप्रारब्धसुरतोत्सवम् ॥ २६ ॥ स्वर्गगीतस्तवोन्मत्तमदनाक्रान्तमार्गगम् । अनारतवहद्धिष्ण्यचक्रलक्षितपक्षकम् ॥ २७ ॥ वातस्कन्धनिखातोन्तर्वहत्त्रिपथगाजलम् । आश्चर्यालोकनव्यग्रसंचरत्त्रिदशार्भकम् ॥ २८ ॥ सदेहसंचरद्वज्रचक्रशूलासिशक्तिमत् । क्वचिन्निर्भित्ति भवनं गायन्नारदतुम्बुरु ॥ २९ ॥ मेघमार्गमहामेघमहारम्भाकुलं क्वचित् । चित्रन्यस्तसमाकारमूककल्पान्तवारिदम् ॥ ३० ॥ उत्पतत्कज्जलाद्रीन्द्रसुन्दराम्भोधरं क्वचित् । क्वचित्कनकनिष्पन्दकान्ततापान्तवारिदम् ॥ ३१ ॥ क्वचिद्दिग्दाहतापाढ्यमृष्यमूकाम्बुदांशुकम् । क्वचिन्निष्पवनाम्भोधिसंरम्भं शून्यताजलम् ॥ ३२ ॥ क्वचिद्वातनदीप्रौढविमानतृणपल्लवम् । क्वचिच्चलदलिव्रातपृष्ठत्वक्कान्तिनिर्मलम् ॥ ३३ ॥ क्वचिन्मेरुनदीकल्पवातधूलिविधूसरम् । क्वचिद्विमानगीर्वाणप्रभाचित्रबलाङ्गकम् ॥ ३४ ॥ क्वचिन्निरम्बरोन्नृत्तमातृमण्डलमालितम् । क्वचिन्नित्यं नवक्षीबक्षुब्धयोगीश्वरीगणम् ॥ ३५ ॥ क्वचिच्छान्तसमाधिस्थविश्रान्तमुनिमालितम् । समं दूरास्तसंरम्भसाधुचित्तमनोहरम् ॥ ३६ ॥ गायत्किन्नरगन्धर्वसुरस्त्रीमण्डलं क्वचित् । क्वचित्स्तब्धपुराकीर्णं वहत्पुरवरं क्वचित् ॥ ३७ ॥ क्वचिद्रुद्रपुरापूर्णं क्वचिद्ब्रह्ममहापुरम् । क्वचिन्मायाकृतपुरं क्वचिदागामिपत्तनम् ॥ ३८ ॥ क्वचिद्भ्रमच्चन्द्रसरः क्वचित्स्तब्धमयंसरः । क्वचित्सरत्सिद्धगणं क्वचिदिन्दुकृतोदयम् ॥ ३९ ॥ क्वचित्सूर्योदयमयं क्वचिद्रात्रितमोमयम् । क्वचित्संध्यांशुकपिलं क्वचिन्नीहारधूसरम् ॥ ४० ॥ क्वचिद्धिमाभ्रधवलं क्वचिद्वर्षत्पयोधरम् । क्वचित्स्थल इवाकाश एव विश्रान्तलोकपम् ॥ ४१ ॥ ऊर्ध्वाधोगमनव्यग्रसुरासुरगणं क्वचित् । पूर्वापरोत्तरायाम्यदिक्संचाराकुलं क्वचित् ॥ ४२ ॥ अपि योजनलक्षाणि क्वचिद्दुष्प्रापभूधरम् । अविनाशितमःपूर्णं दृषद्गर्भोपमं क्वचित् ॥ ४३ ॥ अविनाशिबृहत्तेजः क्वचिदर्कानलोपमम् । हिमानीजठराशीतं क्वचिच्चन्द्रादिसद्मसु ॥ ४४ ॥ क्वचिद्वहत्पुरोवृत्तकल्पवृक्षलतावनम् । क्वचिद्दैत्यहतोत्तुङ्गप्रपतद्देवपत्तनम् ॥ ४५ ॥ वैमानिकनिपातेन वहिलेखाङ्कितं क्वचित् । क्वचित्केतुशतोत्पातमिथःसंघट्टपट्टितम् ॥ ४६ ॥ क्वचिच्छुभग्रहगणप्रगृहीताग्र्यमण्डलम् । क्वचिद्रात्रितमोव्याप्तं क्वचिद्दिवसभास्वरम् ॥ ४७ ॥ क्वचिदुद्गर्जदम्भोदं क्वचिन्मूकामलाम्बुदम् । वातावकीर्णशुक्लाभ्रखण्डपुष्पोत्तरं क्वचित् ॥ ४८ ॥ क्वचिदत्यन्तनिःशून्यमवदातमनन्तरम् । आनन्दमृदुशान्ताच्छं ज्ञस्येव हृदयं ततम् ॥ ४९ ॥ शुक्रवाहनभेकौघैः क्वचिद्गलकृतारवम् । शून्यतावारिवलितं क्षेत्रमाकाशवासिनाम् ॥ ५० ॥ मयूरहेमचूडादिपक्षिभिः क्वचिदावृतम् । विद्याधरीणां देवीनां वाहनैर्विहितास्पदैः ॥ ५१ ॥ क्वचिदभ्रान्तरोन्नृत्यद्गुहमायूरमण्डलम् । क्वचिदग्निशुकैः श्यामं शाद्वलानामिव स्थलम् ॥ ५२ ॥ क्वचित्प्रेतेशमहिषमहिम्ना वामनाम्बुदम् । क्वचिदश्वैस्तृणग्रामशङ्काग्रस्तासिताम्बुदम् ॥ ५३ ॥ क्वचिद्देवपुरव्याप्तं क्वचिद्दैत्यपुरान्वितम् । अन्योन्याप्राप्यनगरं नगरन्ध्रकरानिलम् ॥ ५४ ॥ क्वचित्कुलाचलाकारनृत्यद्भैरवभासुरम् । क्वचित्सपक्षशैलेन्द्रसमनृत्यद्विनायकम् ॥ ५५ ॥ क्वचिद्धर्घरवातौघपक्षप्रोड्डीनपर्वतम् । क्वचिद्गन्धर्वनगरसुरस्त्रीवृन्दबन्धुरम् ॥ ५६ ॥ क्वचिद्वहद्गिरिध्वस्तवृक्षलक्षोच्छ्रिताम्बुदम् । क्वचिन्मायाकृताकाशनलिनीजलशीतलम् ॥ ५७ ॥ क्वचिदिन्दुकराकृष्टिशीतलाह्लादमारुतम् । क्वचित्तप्तानिलादग्धद्रुमपर्वतवारिदम् ॥ ५८ ॥ क्वचिदत्यन्तसंशान्तवातादेकान्तनिर्ध्वनि । क्वचित्पर्वततुल्याभ्रशिखाकूटशतोदयम् ॥ ५९ ॥ क्वचित्प्रावृड्भवोन्मत्तघनाभ्ररवघर्घरम् । क्वचित्सुरासुरगणप्रवृत्तरणदुगमम् ॥ ६० ॥ क्वचिद्व्योमाब्जिनीहंसीस्वनाहूताब्जवाहनम् । क्वचिन्मन्दाकिनीतीरनलिनीलुण्ठकानिलम् ॥ ६१ ॥ स्वशरीरेण गङ्गादिसरितां सन्निधानतः । प्रोड्डीनमत्स्यमकरकुलीराम्बुजकूर्मकम् ॥ ६२ ॥ पातालगार्कजनितभूच्छायाकाकचोपनैः । क्वचित्क्वचिन्मण्डलेषु ग्रस्तचन्द्रार्कमण्डलम् ॥ ६३ ॥ क्वचित्सर्गानिलाधूतमायाकुसुमकाननम् । पतत्पुष्पहिमासारत्रसद्वैमानिकाङ्गनम् ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

साथ उड रहे अतएव चंचल कोए, उल्लू, गीध, चातक आदि पक्षियों और नाच रही डाकिनियों (पिशाच योनि विशेषो) से वह व्याप्त था। कहीं पर कुत्ते, कोए, ऊँट और गदहे के तुल्य अनेक प्रकार के विलक्षण मुँहवाली निष्प्रयोजन (०३) सैकड़ों कोस जाकर लौट रहीं गमनागमन में प्रवृत्त योगिनियों से आवृत्त था । कहीं पर लोकपालों के आगे ही स्थित (८) अन्धकार के तुल्य दृष्टि के प्रसार को रोकनेवाले, धुएँ के तुल्य धुमेले, मेघरूपी मन्दिर में सिद्ध और गन्धवेकि जोड़े सुरत क्रीडा कर रहे थे । कहीं पर आकाशमार्ग से चलनेवाले देववृन्द, स्वर्ग मेँ गाये जा रहे उद्दीपन करनेवाले मनोहर गीतों ओर दिव्य स्तुतियोँसे उन्मत्त और कामपीडासे व्याप्त वे कहीं पर ग्रह- नक्षत्रों के गृहभूत ज्योतिश्चक्र के लगातार चलने पर सूर्य आदि की गति से शुक्लपक्ष ओर कृष्णपक्ष का कालविभाग उसमें दृष्टिगोचर हो रहा था । कहीं पर अनेक प्रकार के वायुसमूहों मेँ से एक वायुसमूहरूप उक्त ज्योतिश्चक्रमे बनाये गये निखात (गड्ढे) के अन्दर गंगाजी का जल बह रहा था, कहीं पर देवताओं के बालक अनेक प्रकार के आश्चर्यमय कौतुकं के दर्शन में व्यावृत होकर घूम रहे थे , कहीं पर व्र, चक्र, त्रिशूल, तलवार ओर शक्ति के अधिष्ठाता देवगण मूर्तिमान होकर संचार कर रहे थे । कहीं पर वह बिना भीत के भवनों से परिपूर्ण था, कहीं पर उसमें नारद ओर तुम्बुरु ऋषि गायन कर रहे थे, कहीं मेघों के संचारप्रदेश मे पुष्करावर्तक आदि महामेघो के प्रलयकालीन वृष्टि रूप महान्‌ आरम्भ से उसमें हलचल मची थी और कहीं पर तो प्रलयकाल के मेघ चित्र में लिखित के तुल्य निश्चेष्ट ओर गर्जनध्वनि-शून्य थे । कहीं पर काजल के महान्‌ पर्वतं के तुल्य सुन्दर मेघ उड़ रहे थे, तो कहीं पर सुवर्ण के द्रव के समान मनोज्ञ सूर्य के ताप को दूर करनेवाले मेघो का जमघट था और कहीं पर दिशाओं के दाह से उत्पन्न सन्ताप से पूर्ण था । ऋष्यमूक पर्वतपर पूर्वं रामायण में वर्णित प्रकार से बरस रहे मेघ ही उसके वस्त्र थे। कहीं पर शून्यता रूपी जल से पूर्ण वह निश्चल सागर के सदृश था। कहीं पर उसमें वायु प्रवाहरूपी नदीं में बड़े बड़ वायुयान ही बहाये जा रहे तिनके और पत्तों के सदुश दिखाई देते थे,कहीं पर उड़ रहे भँवरों की पीठ की त्वचा की कान्ति के तुल्य कान्तिवाला ओर निर्मल था ओर कहीं पर वर्षाकाल की पर्वतीय नदियों के सदुश (समान रंगवाले) वायु में स्थित धूलि के प्रवाहो से वह मटमैला प्रतीत होता था, कहीं पर विमानों पर वैठे हुए देवताओं की कान्तिसे उसकी रूपरेखा चित्रविचित्र (चितकबरी) हो रही थी । कहीं पर निरन्तर नृत्य करनेवाले मातृमण्डल से परिवृत्त था, तो कहीं पर कभी नष्ट न होनेवाले, उन्मत्त ओर विक्षुब्ध योगीश्वरियों के नौ गणो से युक्त था। कहीं शान्त, समाधिस्थ अतएव परमपद में विश्रान्त (ब्रह्मनिष्ठ) मुनियों से परिवेष्टित था । कहीं पर जिसने क्रोध > योगिनियों को अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त रहती हैं, अतः उन्हें अपने स्थानम बैठे बैठे अभीष्ट वस्तु प्राप्त हो सकती है, अतएव उनका दूरगमन प्रयास निरर्थक है | ८ तत्‌ तत्‌ दिशाओं के अधिनायक लोकपाल दिशाओं के अन्त तक रहते हैँ, अतएव वह उनके सामने ही स्थित फिर भी वे उस मेघ मन्दिर के अधिक घन और काला होने के कारण उसकी क्रीड़ाएँ नहीं देख सकते थे। आदि का अत्यन्त परित्याग कर दिया है, ऐसे साधु-महात्मा के चित्त के समान मनोहर और सम (४5) था। कहीं पर उसमें किन्नर, गन्धर्व ओर देवताओं की पत्नियाँ गायन कर रही थीं, कहीं पर वह अचल (स्थिर) नगरों से व्याप्त था, तो कहीं पर उसमें चल रहे सुन्दर-सुन्दर पुरो की (त्रिपुर आदि के सुन्दर पुरों की) प्रचुरता थी । कहीं पर वह शिवजीके नगरों से परिपूर्ण था, तो कहीं पर उसमें ब्रह्माजी के महान्‌ नगर विराजमान थे। कहीं पर उसमें माया द्वारा निर्मित नगर विद्यमान थे, तो कहीं पर भविष्य में बनाये जाने वाले तो, कहीं पर चलता- फिरता चन्द्र रूपी सरोवर विराजमान था तो कहीं पर निश्चल (जो चलने फिरनेवाला नहीं है) सरोवर की छटा देखते ही बनती थी,कहीं पर सिद्धगण धूम रहे थे, कहीं पर चन्द्रोदय की शोभा छटक रही थी तो कहीं पर सूर्योदयका आनन्द अपना अनोखा समा बाँध रहा था, कहीं पर रात्रि के गाढ अन्धकार ने अपनी निराली छटा दिखा रक्खी थी,कहीं पर सन्ध्याकालीन किरणों से लाल हो रहा था, तो कहीं पर कुहरे से मलिन हो रहा था, कहीं पर बरफ के समान सफेद मेघो से शुभ्र था, तो कहीं पर पानी बरसा रहे मेघो से आच्छन्न था, कहीं पर भूमि के तुल्य आकाशमें (आवरणशून्य प्रदेश में) लोकपाल बैठे थे,तो कहीं पर अनेक देवता ओर दैत्य ऊपर नीचे जानेमें व्यावृत थे ओर कहीं पर पूर्व, पश्चिम, उत्तर ओर दक्षिण दिशाओं में संचार (भ्रमण) करनेवाले देव, दानव आदि से ठसाठस भरा था। कहीं पर लाखों कोशो तक भी पर्वतो का नाम निशान नहीं था और कहीं पर (लोकालोक पर्वत के अगल-बगल में) कभी नष्ट न होनेवाले अन्धकार से आवृत्त अतएव पत्थर के भीतरी हिस्से के सामान ठोस था,तो कहीं पर उसमें महान्‌ तेज का कभी विनाश नहीं होता था, अतएव उस भाग में वह सूर्य ओर अग्नि के तुल्य तेजस्वी था, कहीं पर चन्द्र आदि गृहों में बरफ की चट्टान के मध्यभाग की नाई चारों तरफ शीतल था। कहीं पर दैत्यों के भय से उखाड़ कर ले जा रहे देवताओं के अनुचरं द्वारा कल्पवृक्ष-लताका वन पुरस्कृत था, कहीं पर दैत्यों द्वारा छिन्न-भिन्न देवताओं का उन्नत नगर गिर रहा था, तो कहीं पर स्वर्गस्थ लोगोके, पुण्यक्षय के पश्चात्‌, पतन से आग की रेखा की नाई अंकित था (=) । कहीं पर वह सैकड़ों धूमकेतुओं के उदय और परस्पर संमर्दं से वस्त्र की भोति निबिडित (आच्छन्न) था, कहीं पर सूर्य, चन्द्र आदि शुभग्रहों से उसका श्रेष्ठ उर्ध्वमण्डल आक्रान्त था, कहीं पर वह रात्रि के अन्धकार से आवृत्त था, कहीं पर दिन के प्रकाश से चमक रहा था, कहीं पर उसमें जलपूर्ण मेचमण्डल अपना गर्जन -तर्जन दिखा रहा था, तो कहीं पर जलशून्य निर्मल मेघ चुप लगाये थे, कहीं पर उसमें स्थित शुभ्र मेघखण्डरूपी पुष्प शय्या वायु द्वारा अतस्ततः बिखेर दी गई थी । कहीं पर वह ज्ञानीजन के हृदय की नाई दृश्य पदार्थो से अत्यन्त शून्य, स्वच्छ अज्ञानरूपी मेघ के व्यवधान से रहित, आनन्दरूप, र्घम्‌ महात्मा का चित्त भी सब पर सम होता है और वह भी सम यानी विषमता से शून्य (निर्बधि) था। [च्‌ पुण्य क्षीण होने पर स्वर्गस्थ लोग जब मर्त्यलोक में गिरते हैं तो उनके गिरने के समय उनके प्रचुर तेज से आकाश में आग की सी तेज रेखा खिंच जाती है जैसे कि ऊँचे स्थान से बड़े वेग से जलती हुई लकड़ी फेंकी जाय, तो आग की रेखा सी बन जाती है । कोमल, शान्त ओर धूलिकणों से रहित था (& ) । मानों वह आकाशवासियों का खेत था, जैसे खेतों मे मेढक बोलते हैं और जल भरा रहता हे, वैसे ही उसमें शुक्रशब्द से उपलक्षणविधया उक्त आकाशचारियों के वाहनरूपी मेढक द्वारा शब्द करते थे ओर शून्यतारूपी जल से वह पूर्ण था । कहीं पर विद्याधरी देवियों के वाहन मयूर, हेमचूड आदि पक्षियों से, जिन्होंने कि उसमें अपने अपने घोंसले बना रक्खे थे, व्याप्त था । कहीं पर मेघमण्डल के अन्दर कार्तिकिय के वाहन मयूरो का झुण्ड उसमें नाच कर रहा था, कहीं पर वह अग्नि के वाहन शुकों से (२) हरी घास के मैदान के तुल्य हरा था । कहीं पर उसमें यमराज के वाहन भैंस की महिमा से (बृहत्कलेवररूप महिमा से) मेघ छोटा-सा प्रतीत होता था, कहीं पर सूर्य के घोड़ों ने हरे घास की आशंका से काले काले बादलों को निगल डाला था । कहीं पर देवताओं के नगर से व्याप्त था, कहीं पर दैत्यों के नगरों का तांता लगा था, वे लोग एक दूसरे के नगर को नहीं पा सकते थे, क्योकि उनके नगरों के बीच में पहाड़ों में भी छेद करने में समर्थ यानी अतिबलवान्‌ वायु का आवास था। कहीं पर कुलाचलों के (मेरु आदि सात कुल पर्वतो के) तुल्य विशाल काय नाच रहे भैरवों से जगमगा रहा था, कहीं पर पंखवाले महान्‌ पर्वतो के तुल्य विनायक नृत्य कर रहे थे। कहीं पर पर्वत घडघडाहट और वायु के झोकों के साथ पंखों से उडते थे, कहीं पर गन्धर्वो का नगर था, जिसमें झुण्ड की झुण्ड अप्सराएँ निवास करती थीं । कहीं पर मेघ उड रहे पर्वतों द्वारा छिन्न-भिन्न तथा लाखों वृक्षों द्वारा छाते के समान ऊपर ताने गये थे, कहीं पर वह माया द्वारा निर्मित आकाश कमलिनी (कमलयुक्त सरोवर) के जल से शीतल था। कहीं पर वायु चन्द्रकिरणों के संसर्ग से शीतल और आह्लादकारी था, तो कहीं सूर्यकिरणों से तप्त वायु से (लू से) पर्वत, पेड ओर मेघ जल रहे थे । कहीं पर वायु के अत्यन्त शान्त होने के कारण बिलकुल सन्नाटा छाया था, कहीं पर पहाड़ों के समान विशालकाय मेघों के सैकड़ों शिखरसमूह उदित हो रहे थे । कहीं पर उसमें वर्षाऋतु के उद्दाम और निविड मेघमण्डल के गर्जन की गड़गड़ाहट हो रही थी, कीं पर प्रवृत्त (हो रहे) देवासुरसंग्राम के कारण जाना बड़ा कठिन था। कहीं पर आकाशकमलिनी में रहनेवाली हंसी अपने मधुर स्वर से ब्रह्माजीके वाहन हंस का आह्वान करती थी, कहीं पर वायु मन्दाकिनी के तीर की कमलिनियों की सुगन्धि चुरा रहा था गंगादि पुण्य नदियों की सन्निधि होने से मछली, मगर, केकड़े, वेतस (बेंत के वृक्ष) कछुए देवताओं का शरीर धारण कर उडते थे । भूगोल के चारों ओर सूर्य के घूमनेपर पृथिवी की छाया भी घूमती है, जब सूर्य पाताल में जाता है, तब पृथिवी की छाया ऊपर को फैलती है, काली होने से वही काक ठहरी, उसके आक्रमणों से किन्हीं किन्हीं मण्डलो में चन्द्र और सूर्य मण्डल में ग्रहण लगा था। कहीं पर विमानचारी देवताओं द्वारा अपनी अंगनाओं के विस्मय के &. जानी के हृदय में भी सम्पूर्णं विशेषण लगाने चाहिए । वह दृश्य पदार्थ मेँ आसक्ति से शून्य, स्वच्छ, अज्ञानरूपी आवरण से रहित, आनन्दमय, कोमल, शान्त और रजोगुण से रहित होता है । २ यद्यपि सर्वत्र अग्नि का वाहन मेष ही प्रसिद्ध है, तथापि यहाँ के कथन से अग्नि का वाहन शुक भी है, ऐसा जानना चाहिए । लिए रचित मायिक सृष्टि के वायुओं द्वारा मायानिर्मित फूलों का बन हिलाया जाता था, अतएव गिर रहे पुष्परूपी हिम की लगातार वृष्टि से विमानचारी देवताओं की अंगनाएँ भयभीत हो रही थीं