Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 24, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 24, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
दूराद्दूरमभिप्लुत्य शनैरुच्चैः पदं गते ।
हस्तं हस्ते समालम्ब्य यान्त्यौ ददृशतुर्नभः ॥ १ ॥
एकार्णवमिवोच्छूनं गम्भीरं निर्मलान्तरम् ।
कोमलं कोमलमरुदासङ्गसुखभोगदम् ॥ २ ॥
आह्लादकमलं सौम्यं शून्यताम्भोनिमज्जनात् ।
अत्यन्तशुद्धं गम्भीरं प्रसन्नमपि सज्जनात् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
चौबीसवाँ सर्ग
जा रही ज्ञप्ति देवी ओर लीला का असीम विश्व के वैचित्र्य के
विलासों से परिपूर्ण आकाशरूप मार्ग का वर्णन ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्र, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जा रही धीरे धीरे
ऊपर चढ़कर अत्यन्त दूर ऊर्ध्वस्थान में गई हुई उन दोनों सखियों ने आकाशको देखा ।
आकाश तरंगित प्रलयकाल के एकमात्र समुद्र के समान गंभीर, निर्मल ओर स्निग्ध (बाधाशून्य),
मन्द, सुगन्ध ओर शीतल वायु के संसर्ग से सुखभोग का दाता, शून्यतारूपी जलमें अवगाहन
करने से अत्यन्त आनन्ददायक अथवा जगत् शून्यतारूप ब्रह्मजलमें पहले पहल निर्गमन
करने से प्राणीरूपी भ्रमरोंको आह्णादित करनेवाला कमलरूप, शान्त, अत्यन्त स्वच्छ, गम्भीर
ओर सज्जन के मन से भी बढ़कर प्रसन्न था
सर्ग सन्दर्भ
तेईसवाँ सर्ग समाप्त २ इस विषय में दो मत हैं एक मत यह है कि योगी लोग समाधि द्वारा स्थूल देह से बाहर निकल कर सूक्ष्म देह से बाहर पर्यटन करते हैं दूसरा मत यह कि योगी लोग देह से बाहर नहीं निकलते, मात्र स्थूल देह के अभिमान का परित्याग कर और हृदय से लेकर कंठ तक बिलस्तभर नाड़ी में स्थित होकर या आरोहण कर सर्वव्यापी ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं उसी ज्ञान से वे लोग स्वर्ग, मृत्यु, पाताल आदि लोकों का दर्शन करते हैं ।