Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 20, 21
संस्कृत श्लोक
असत्याद्यत्समुत्पन्नं स्मृत्या नाम तदप्यसत् ।
मृगतृष्णातरङ्गिण्यां तरङ्गोऽपि न सद्यतः ॥ २० ॥
इदं त्वदीयं सदनं तद्गेहाकाशकोशगम् ।
विद्धि मां त्वां च सर्वं च तच्चिद्व्योमैव केवलम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व सर्ग के असत्य होने पर भी इस सर्ग में क्या आया ? इस पर कर्ती है ।
भद्रे, असत्यरूप कारण से जो उत्पन्न होता है, वह स्मृतिरूप होने के कारण असत्य ही
है, क्योंकि मृगतृष्णा से कल्पित सरिता में तरंग भी सत् नहीं होता। हे भद्रे, उक्त देहाकाशरूप
कोश में स्थित तुम्हारा यह घर, मैं, तुम और यह सब केवल चिदाकाशरूप ही हैं