Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, Verses 34–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, verses 34–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
त्रिरात्रशतमेवं सा बाला नियमशालिनी ।
अनारतं तपोनिष्ठामतिष्ठत्कष्टचेष्टया ॥ ३४ ॥
त्रिरात्राणां शते चाथ पूजिता प्रतिमानिता ।
तुष्टा भगवती गौरी वागीशा समुवाच ताम् ॥ ३५ ॥
श्रीसरस्वत्युवाच ।
निरन्तरेण तपसा भर्तृभक्त्यतिशालिना ।
परितुष्टास्मि ते वत्से गृहाण वरमीप्सितम् ॥ ३६ ॥
श्रीराज्ञ्युवाच ।
जय जन्मजराज्वालादाहदोषशशिप्रभे ।
जय हार्दान्धकारौघनिवारणरविप्रभे ॥ ३७ ॥
अम्ब मातर्जगन्मातस्त्रायस्व कृपणामिमाम् ।
इदं वरद्वयं देहि यदहं प्रार्थये शुभे ॥ ३८ ॥
एकं तावद्विदेहस्य भर्तुर्जीवो ममाम्बिके ।
अस्मादेव हि मा यासीन्निजान्तःपुरमण्डपात् ॥ ३९ ॥
द्वितीयं त्वां महादेवि प्रार्थयेऽहं यदा यदा ।
दर्शनाय वरार्थाय तदा मे देहि दर्शनम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा विचार करके वह सुन्दरी अपने पति से पूछे बिना ही विधिपूर्वक
(७७) उग्र तपस्या करने लगी । तीसरी-तीसरी रात के बाद वह सदा पारणा करती थी, देवता,
ब्राह्मण, गुरु, विद्धान् और ब्रह्मज्ञानी लोगों की पूजा में तत्पर रहती थी ॥३०, ३ १॥ इस कर्म
का फल अवश्य होगा, ऐसी आस्तिकबुद्धि ओर सदाचार सम्पन्न तथा क्लेश का निवारण
करनेवाली लीला ने अपने शरीर को स्नान, दान, तपस्या और ध्यान में सदा तत्पर कर दिया ।
वह पहले जैसे समयमें, जैसी लगन से, जैसी शास्त्र की विधि के अनुसार और जैसे क्रम से
पति की सेवा-शुश्रुषा करती थी उसमें किसी प्रकार का हेर फेर किये बिना पति को सन्तुष्ट
करती गई । लेकिन उसने पति के समक्ष अपने उपवास का भेद प्रकट नहीं किया ॥ ३२, ३ ३॥
इस तरह नियमपूर्वक रह कर पतिपरायणा उस नारी ने जब तक सौ त्रिरातव्रत पूर्ण नहीं हुए,
तब तक लगातार क्लेश के साथ तपस्या की सौ त्रिरात्रव्रतों की पूर्ति होने पर लीला द्वारा
अर्ध्य, पाद्य, स्नान, गन्ध, पुष्प आदि बाहरी उपचारों से पूजित और ध्यान आदि भीतरी
उपचारो से सत्कृत भगवती सरस्वती ने प्रसन्न होकर उससे कहा : वत्से, तुम्हारी अविच्छिन्न
(अटूट) ओर पतिभक्ति से ओतप्रोत (सराबोर) तपश्चर्या से मेँ तुम पर अति प्रसन्न हूँ, अतः
तुम्हें जिस वस्तु की चाह हो, वह मुझसे लो