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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, Verses 29–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, verses 29–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

अद्यैवारभ्यैतदर्थ देवीं ज्ञप्तिं सरस्वतीम् । जपोपवासनियमैरातोषं पूजयाम्यहम् ॥ २९ ॥ इति निश्चित्य सा नाथमनुक्त्वैव वराङ्गना । यथाशास्त्रं चचारोग्रं तथा नियममास्थिता ॥ ३० ॥ त्रिरात्रस्य त्रिरात्रस्य पर्यन्ते कृतपारणा । देवद्विजगुरुप्राज्ञविद्वत्पूजापरायणा ॥ ३१ ॥ स्नानदानतपोध्याननित्योद्युक्तशरीरिका । सर्वास्तिक्यसदाचारकारिणी क्लेशहारिणी ॥ ३२ ॥ यथाकालं यथोद्योगं यथाशास्त्रं यथाक्रमम् । तोषयामास भर्तारमपरिज्ञातसंस्थितिः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

मेरे पति का जीव जिसमें घूमता रहे, ऐसे अन्तःपुर के खण्ड में सदा भर्ता द्वारा देखी जाती हुई मैं सुखपूर्वक निवास करूंगी ॥२ ८॥ अपने इस संकल्प की सिद्धि के लिए आज से ही मैं ज्ञान रूपा सरस्वती देवी का जप, तप आदि से, जब तक वह प्रसन्न न हो, पूजन करती हूँ