Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
वेद्यवेदनवेत्तृत्वरूपत्रयमिदं पुरः ।
यत्रोदेत्यस्तमायाति तत्तत्परमदुर्लभम् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
वेद्य (ज्ञेय) आदि त्रिपुटी के जन्म आदिका हेतु जो सच्चिदानन्दात्मक रूप हे, वही वह
है, - ऐसा कहते हैँ ।
ज्ञेय, ज्ञान ओर ज्ञाता-इन तीन रूपोंवाला सामने विद्यमान यह प्रपंच जिससे आविर्भूत होता
है, जिसमें स्थित रहता है और जिसमें लीन हो जाता है, वही उसका परम दुर्लभ रूप हे