Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 43–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, verses 43–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 43-49
संस्कृत श्लोक
अस्वप्नाया अनन्ताया अजडाया मनःस्थितेः ।
यद्रूपं चिरनिद्रायास्तत्तदानघ शिष्यते ॥ ४३ ॥
यद्व्योम्नो हृदयं यद्वा शिलायाः पवनस्य च ।
तस्याचेत्यस्य चिद्व्योम्नस्तद्रूपं परमात्मनः ॥ ४४ ॥
अचेत्यस्यामनस्कस्य जीवतो या स्वभावतः ।
स्यात्स्थितिः सा परा शान्ता सत्ता तस्याद्यवस्तुनः ॥ ४५ ॥
चित्प्रकाशस्य यन्मध्यं प्रकाशस्यापि खस्य वा ।
दर्शनस्य च यन्मध्यं तद्रूपं ब्रह्मणो विदुः ॥ ४६ ॥
व्रेदनस्य प्रकाशस्य दृश्यस्य तमसस्तथा ।
वेदनं यदनाद्यन्तं तद्रूपं परमात्मनः ॥ ४७ ॥
यतो जगदुदेतीव नित्यानुदितरूप्यपि ।
विभिन्नवदिवाभिन्नं तद्रूपं परमार्थकम् ॥ ४८ ॥
व्यवहारपरस्यापि यत्पाषाणवदासनम् ।
अव्योम्न एव व्योमत्वं तद्रूपं परमात्मनः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
अब उक्त रूप योगाभ्यास से रहित पुरुषों के भी अनुभवमे जैसे आरूढ हो, वैसा उसका
प्रतिपादन करते हैं ।
हे अनघ, जिसमें स्वप्नदर्शन नहीं है, जो मच्छर, खटमल आदि द्वारा जनित बीच बीच में
विच्छेद से रहित है, मनकी विश्रान्ति का हेतु, सुषुप्तिरूप मनकी जड़ता से हीन गाढ़ निद्रा का
जो रूप है, वही उस परमात्मा का रूप प्रलयकाल में अवशिष्ट रहता हे । जैसे आकाशका
तात्त्विक रूप शून्यत्व हे, शिलाका घनत्व है ओर वायुका अन्तर्बहिःपूर्णत्व है, वैसे ही उसी
दृश्यभिन्न ओर दुश्यरहित चिदाकाश परमात्मा का जो रूप हो, वही वह हे । बहुत क्या कहें
सम्पूर्ण जीवित जीवों की चेत्य (दृश्य) ओर चित्त का परित्याग करने पर स्वभावतः जो स्थिति
अवशिष्ट रहती है, वह शान्त उत्कृष्ट सत्ता उस आदिपुरुष का रूप हे । चित्-प्रकाश
अन्नमयकोषपर्यन्त आत्मरूप से व्याप्त है, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और
आनन्दमय-इन पाँच कोषो में प्रत्येक कोषका विवेक-पूर्वक विचार करने से आनन्दमय कोष
सब कोषोंका आन्तर ठहरता है ओर आनन्दमय कोषका आन्तर ब्रह्म है, अतः द्रष्ट्कोटि में
सर्वन्तिरभूत चित्प्रकाशरूप आनन्दमय कोषका भी आन्तर होने से जो मध्य है (५६) | ओर
दृश्यकोटि में मूर्त प्रपंच के सारभूत सूर्यरूप प्रकाश का, अमूर्त प्रपंच के सारभूत भूताकाशका
अथवा लिंगसमष्टिरूप अव्याकृत आकाशका आन्तर होने से जो मध्य हे (च्) तथा चाक्षुष
आदि वृत्तियों के भीतर स्फुरणरूप से विद्यमान होने से जो उक्त वृत्तियोका मध्य है (9. )
क्रमश: जो आनन्द, सत् ओर चिद्रूप है, उसीको ज्ञानी जन ब्रह्म का रूप जानते हैँ । बुद्धिवृत्तिका,
पदार्थो के स्फुरणका, विषयका और अज्ञानका साक्षीरूप आदि और अन्त से शून्य जो ज्ञान
हे, वह उस परमात्मा का रूप हे । जिसका रूप कभी उदित नहीं हुआ यानी नित्य अनुदित
रूपवाला होता हुआ भी जगत् जिससे उदित-सा होता है, जिससे अभिन्न होता हुआ भी
बिलकुल भिन्न-सा प्रतीत होता है, वह परमात्मा का पारमार्थिक रूप हे । मायिक व्यवहारोंमें
संलग्न हुए भी जिसकी (ज्ञानी की अथवा ईश्वर की) पाषाण के सदुश जो निश्चल स्थिति है
ओर निरवकाश (सूराख आदि से शून्य) होते हुए भी सम्पूर्ण जगत् को अपने में अवकाश देने
से जो व्योमता (सावकाशता) है, वही परमात्मा का रूप है