Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
भूर्जलाद्युपमानश्रीः साकारान्ता समानसा ।
ब्रह्म त्वाकाशविशदं तस्यान्तस्थं तथैव तत् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि जल के अन्दर स्थित पृथिवी अपने आधार जलरूप नहीं देखी
जाती ओर घडे आदि के अन्दर स्थित जल अपने आधारभूत घट आदिरूप नहीं देखा जाता,
फिर ब्रह्म के अन्दर स्थित जगत् ही अपने आधार ब्रह्मरूप कैसे ?
आपने जो पृथिवी, जल आदि दृष्टान्तरूप से उपस्थित किये हैं, वे सम नहीं हैं, किन्तु
विषम हैं, क्योंकि वे सदा साकार ही दिखाई देते हैं और ब्रह्म आकाशसदृश निराकार है,
निराकार ब्रह्म के अन्दर विलीन यह जगत् ब्रह्म के सदुश ही निराकार है