Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मण्ययं प्रकाशो हि न संभवति भूतजः ।
सूर्यानलेन्दुतारादिः कुतस्तत्र किलाव्यये ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार “न शून्यं कथमेतत्स्यात्“ इत्यादि से उक्त प्रथम प्रश्न का समाधान कर अव न
प्रकाशः कथं भवेद्“ इत्यादि से उक्त दूसरे प्रश्न का समाधान करते है ।
जलरूप इन्धन के या पार्थिव इन्धन के व्यय से भौतिक सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, तारा आदि
के प्रकाश का संभव है, किन्तु अव्यय ब्रह्म में वह प्रकाश कैसे ?