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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

आलस्यं यदि न भवेज्जगत्यनर्थः को न स्याद्बहुधनको बहुश्रुतो वा । आलस्यादियमवनिः ससागरान्ता संपूर्णा नरपशुभिश्च निर्धनैश्च ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा है, तो सभी लोग क्यो यत्न नहीं करते, इस पर कहते है । अनर्थ (दुर्गति) का कारण होने या अर्थ (उन्नति) का विघातक होने के कारण अनर्थकारी आलस्य यदि जगत्‌ में न होता, तो कौन पुरुष बड़ा धनी ओर विद्वान नहीं होता अर्थात्‌ सभी धनी ओर विद्वान होते आलस्य के कारण ही यह सागरपर्यन्त सम्पूर्ण पृथिवी निर्धनो ओर नरपशुओं से परिपूर्ण है इसलिए आलस्य का परित्याग कर बाल्यावस्था से ही मनुष्य को सत्संग, शास्त्राभ्यास आदि में जुट जाना चाहिए, यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है