Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verses 28–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
आबाल्यादलमभ्यस्तैः शास्त्रसत्सङ्गमादिभिः ।
गुणैः पुरुषयत्नेन स्वार्थः संप्राप्यते यतः ॥ २८ ॥
इति प्रत्यक्षतो दृष्टमनुभूतं श्रुतं कृतम् ।
दैवात्तमिति मन्यन्ते ये हतास्ते कुबुद्धयः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि बहुत परिश्रम की अपेक्षा नहीं है, तो पीछे पौरुष करेगे, इसी समय उसकी क्या
आवश्यकता है 2 ऐसी शंका होने पर कहते है ।
बाल्यावस्था से लेकर भलीभाँति अभ्यस्त शास्त्र, सत्संग आदि गुणों द्वारा पुरुषप्रयत्न से
({=-)) स्वार्थ (तत्त्वसाक्षात्कार) प्राप्त होता है, सहसा किये गये शारत्राभ्यास, सत्संग आदि
से वह प्राप्त नहीं किया जा सकता । वे तो कोमल कटि के समान हैं | भाव यह कि जैसे कोमल
कटि से पैर में चुभा हुआ कटा नहीं निकाला जा सकता वैसे ही सहसरा अभ्यस्त शास्त्र आदि
से तत््वसाक्षात्कार नहीं किया जा सकता । हम जीवन्मुक्त लोगों ने इस बात को प्रत्यक्षतः
देखा हे, उसका अनुभव किया है, सुना और साधनों से उपार्जित किया है, जो लोग उसे
दैवाधीन कहते हैं, वे मन्दमति हैं और विनष्ट हैं