Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अविद्यैव ह्यनन्तेयं नानाप्रसरशालिनी ।
जडानां सरिदादीर्घा तरत्सर्गतरङ्गिणी ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
मूलोच्छेद के बिना, केवल अपलापमात्रसे, उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा मन में
रखकर अविद्या में उच्छेद्यत्व को बतलाने के लिए सूक्ष्मरूप से व्युत्पादित प्रपंच में कारणीभूत
अविद्यामात्रता ही है, ऐसा कहते है ।
मूढ़ों द्वारा तैरने के अयोग्य, विविध शाखा-प्रशाखाओं से युक्त अतएव अनन्त यह अविद्या
लगातार हो रहे सृष्टिरूप तरंगों से युक्त विशाल नदी है