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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 16, Verses 30–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 16, verses 30–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

देवो भवाथ यक्षो वा पुरुषः पादपोऽथ वा । तावत्तव महाबाहो नोपायोऽस्तीह कश्चन ॥ ३० ॥ एकस्मिन्नेव फलदे गुणे बलमुपागते । क्षीयन्ते सर्व एवाशु दोषा विवशचेतसः ॥ ३१ ॥ गुणे विवृद्धे वर्धन्ते गुणा दोषजयप्रदाः । दोषे विवृद्धे वर्धन्ते दोषा गुणविनाशनाः ॥ ३२ ॥ मनोमोहवने ह्यस्मिन्वेगिनी वासनासरित् । शुभाशुभबृहत्कूला नित्यं वहति जन्तुषु ॥ ३३ ॥ सा हि स्वेन प्रयत्नेन यस्मिन्नेव निपात्यते । कूले तेनैव वहति यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ३४ ॥ पुरुषयत्नजवेन मनोवने शुभतटानुगतां क्रमशः कुरु । वरमते निजभावमहानदीमहह तेन मनागपि नोह्यसे ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

सात्विक देव आदि जन्म के लिए प्रयत्न करना चाहिए, देव आदि जन्म प्राप्त होने पर बिना परिश्रम के ज्ञान होगा, , इस शंका पर कहते है । हे महाबाहो, आप चाहे देवता होइए या यक्ष होइए, पुरूष होइए अथवा वृक्ष होडए पर जब तक आपका चित्त गुणों के उपार्जन के लिए आग्रहवान्‌ न होगा तब तक उत्तम गति का कोई उपाय नहीं हे । फलदायक एक ही गुण के दृढ होने पर दोषाधीन चित्त के सम्पूर्ण दोष शीघ्र ही क्षीण हो जाते हैं