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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, Verses 6–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, verses 6–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 6-45

संस्कृत श्लोक

भृग्वंगिरःपुलस्त्यादिमुनिनायकमण्डिता । च्यवनोद्दालकोशीरशरलोमादिमालिता ॥ ६ ॥ परस्परपरामर्शदुःसंस्थानमृगाजिना । लोलाक्षमालावलया सुकमण्डलुधारिणी ॥ ७ ॥ तारावलिरिव व्योम्नि तेजःप्रसरपाटला । सूर्यावलिरिवान्योन्यं भासिताननमण्डना ॥ ८ ॥ रत्नावलिरिवान्योन्यं नानावर्णकृतांगिका । मुक्तावलिरिवान्योन्यं कृतशोभातिशायिनी ॥ ९ ॥ कौमुदीवृष्टिरन्येव द्वितीयेवार्कमण्डली । संभृतेवातिकालेन पूर्णचन्द्रपरम्परा ॥ १० ॥ ताराजाल इवाम्भोदो व्यासो यत्र विराजते । तारौघ इव शीतांशुर्नारदोऽत्र विराजते ॥ ११ ॥ देवेष्विव सुराधीशः पुलस्त्योऽत्र विराजते । आदित्य इव देवानामंगिरास्तु विराजते ॥ १२ ॥ अथास्यां सिद्धसेनायां पतन्त्यां नभसो रसाम् । उत्तस्थौ मुनिसंपूर्णा तदा दाशरथी सभा ॥ १३ ॥ मिश्रीभूता विरेजुस्ते नभश्चरमहीचराः । परस्परवृतांगाभा भासयन्तो दिशो दश ॥ १४ ॥ वेणुदण्डावृतकरा लीलाकमलधारिणः । दूर्वांकुराक्रान्तशिखाः सचूडामणिमूर्धजाः ॥ १५ ॥ जटाजूटैश्च कपिला मौलिमालितमस्तकाः । प्रकोष्ठगाक्षवलया मल्लिकावलयान्विताः ॥ १६ ॥ चीरवल्कलसंवीताः स्रक्कौशेयावगुण्ठिताः । विलोलमेखलापाशाश्चलन्मुक्ताकलापिनः ॥ १७ ॥ वसिष्ठविश्वामित्रौ तान्पूजयामासतुः क्रमात् । अर्घ्यैः पाद्यौर्वचोभिश्च सर्वानेव नभश्चरान् ॥ १८ ॥ वसिष्ठविश्वामित्रौ ते पूजयामासुरादरात् । अर्घ्यैः पाद्यैर्वचोभिश्च नभश्चरमहागणाः ॥ १९ ॥ सर्वादरेण सिद्धौघं पूजयामास भूपतिः । सिद्धौघो भूपतिं चैव कुशलप्रश्नवार्तया ॥ २० ॥ तैस्तैः प्रणयसंरम्भैरन्योन्यं प्राप्तसत्क्रियाः । उपाविशन्विष्टरेषु नभश्चरमहीचराः ॥ २१ ॥ वचोभिः पुष्पवर्षेण साधुवादेन चाभितः । रामं ते पूजयामासुः पुरः प्रणतमास्थितम् ॥ २२ ॥ आसांचक्रे च तत्रासौ राज्यलक्ष्मीविराजितः । विश्वामित्रो वसिष्ठश्च वामदेवोऽथ मन्त्रिणः ॥ २३ ॥ नारदो देवपुत्रश्च व्यासश्च मुनिपुंगवः । मरीचिरथ दुर्वासा मुनिरांगिरसस्तथा ॥ २४ ॥ क्रतुः पुलस्त्यः पुलहः शरलोमा मुनीश्वरः । वात्स्यायनो भरद्वाजो वाल्मीकिर्मुनिपुंगवः ॥ २५ ॥ उद्दालक ऋचीकश्च शर्यातिश्च्यवनस्तथा ॥ २६ ॥ एते चान्ये च बहवो वेदवेदांगपारगाः । ज्ञातज्ञेया महात्मान आस्थितास्तत्र नायकाः ॥ २७ ॥ वसिष्ठविश्वामित्राभ्यां सह ते नारदादयः । इदमूचुरनूचाना राममानमिताननम् ॥ २८ ॥ अहो बत कुमारेण कल्याणगुणशालिनी । वागुक्ता परमोदारा वैराग्यरसगर्भिणी ॥ २९ ॥ परिनिष्ठितवक्तव्यं सबोधमुचितं स्फुटम् । उदारं प्रियमार्यार्हमविह्नलमपि स्फुटम् ॥ ३० ॥ अभिव्यक्तपदं स्पष्टमिष्टं स्पष्टं च तुष्टिमत् । करोति राघवप्रोक्तं वचः कस्य न विस्मयम् ॥ ३१ ॥ शतादेकतमस्यैव सर्वोदारचमत्कृतिः । ईप्सितार्थार्पणैकान्तदक्षा भवति भारती ॥ ३२ ॥ कुमार त्वां विना कस्य विवेकफलशालिनी । परं विकासमायाति प्रज्ञाशरलतातता ॥ ३३ ॥ प्रज्ञादीपशिखा यस्य रामस्येव हृदि स्थिता । प्रज्वलत्यसमालोककारिणी स पुमान्स्मृतः ॥ ३४ ॥ रक्तमांसास्थियन्त्राणि बहून्यतितराणि च । पदार्थानभिकर्षन्ति नास्ति तेषु सचेतनः ॥ ३५ ॥ जन्ममृत्युजरादुःखमनुयान्ति पुनःपुनः । विमृशन्ति न संसारं पशवः परिमोहिताः ॥ ३६ ॥ कथंचित्क्वचिदेवैको दृश्यते विमलाशयः । पूर्वापरविचारार्हो यथायमरिमर्दनः ॥ ३७ ॥ अनुत्तमचमत्कारफलाः सुभगमूर्तयः । भव्या हि विरला लोके सहकारद्रुमा इव ॥ ३८ ॥ सम्यग्दृष्टजगद्यात्रा स्वविवेकचमत्कृतिः । अस्मिन्मान्यमतावन्तरियमद्येव दृश्यते ॥ ३९ ॥ सुभगाः सुलभारोहाः फलपल्लवशालिनः । जायन्ते तरवो देशे न तु चन्दनपादपाः ॥ ४० ॥ वृक्षाः प्रतिवनं सन्ति नित्यं सफलपल्लवाः । नत्वपूर्वचमत्कारो लवङ्गः सुलभः सदा ॥ ४१ ॥ ज्योत्स्नेव शीता शशिनः सुतरोरिव मञ्जरी । पुष्पादामोदलेखेव दृष्टा रामाच्चमत्कृतिः ॥ ४२ ॥ अस्मिन्नुद्दामदौरात्म्यदैवनिर्माणनिर्मिते । द्विजेन्द्रा दग्धसंसारे सारो ह्यत्यन्तदुर्लभः ॥ ४३ ॥ यतन्ते सारसंप्राप्तौ ये यशोनिधयो धियः । धन्या धुरि सतां गण्यास्त एव पुरुषोत्तमाः ॥ ४४ ॥ न रामेण समोऽस्तीह दृष्टो लोकेषु कश्चन । विवेकवानुदारात्मा न भावी चेति नो मतिः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

बढ़ानेवाली मुनिमण्डली मुक्तावली के समान दिखाई दे रही थी, वह मुनिमण्डली क्या थी मानों दूसरी चाँदनी की छटा थी, दूसरी सूर्य- मण्डली थी ओर दीर्घकाल से एक स्थान में संचित पूर्णचन्द्रों की परम्परा थी। उस मुनिमण्डली में, तारागणों में सजल मेघ के समान एक और व्यासजी विराजमान थे, तारागणों में चन्द्रमा के सदृश दूसरी ओर नारदजी विराजमान थे, देवताओ में देवराज के सदृश महर्षि पुलस्त्य विराजमान थे ओर देवमण्डल में सूर्य के समान अंगिरा विराजमान थे । उक्त सिद्धसेना के आकाश से पृथिवी पर आने पर महाराज दशरथ की वह सम्पूर्ण सभा उनके स्वागत के लिए उठ खडी हुई । एकत्र हुए अतएव एक दूसरे की छवि को धारण किये हुए ओर दशो दिशाओं को प्रकाशमय कर रहे वे आकाशचारी ओर भूमिचर अतिशोभित हुए । उनमें से किन्हींके हाथ में बाँसकी लाठियाँ थी, किन्हीके हाथ में लीला-कमल थे, किन्हीकि सिर में दूब के तिनके थे ओर किन्हींके केशो में चूडामणिर्यो चमक रही थी, कोई जटाजूटों से कपिल हो रहे थे, किन्हीं का मस्तक, मालाओं से वेष्टित था, किन्हीकी कलाई में रुद्राक्ष की मालाएँ थी, किन्हीं के हाथ मेँ मल्लिका की मालाएँ शोभित हो रही थी, कोई चीर वल्कलधारी थे, कोई सूक्ष्म रेशमी वस्त्र पहिरे थे किन्ही के अंग में मूंज की मेखलाएँ लटक रही थी और कोई मुक्तहारों से अलंकृत थे । वसिष्ठ और विश्वामित्र ने अर्घ्य, पाद्य और मधुरवचनों द्वारा क्रमशः सभी आकाशचारियों की पूजा की । आकाशचारी उन सिद्धं ने भी श्रीवसिष्ठ ओर विश्वामित्रजीकी अर्घ्य, पाद्य और मधुर वचनों द्वारा बड़े आदर के साथ पूजा की । तदुपरान्त महाराज दशरथने सिद्ध मण्डली का बड़े आदर से पूजन किया और सिद्धोने कुशलप्रश्न द्वारा महाराज दशरथ का सत्कार किया । पूर्वोक्त प्रेमोचित दान, सम्मान आदि के वेग से परस्पर आदर-सत्कार प्राप्त कर सब आकाशचारी सिद्ध महात्मा ओर भूमिचर अपने-अपने आसनोपर बैठ गये। सामयिक वार्तालाप, प्रशंसा और पुष्पवृष्टि द्वारा खूब सत्कार किया । पूर्वोक्त सिद्ध महात्माओं के मध्य में राज्यलक्ष्मी से विभूषित श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हुए ओर वसिष्ठ, वामदेव, सुयज्ञ आदि मन्त्री, ब्रह्मापुत्र श्रीनारदजी, मुनिश्रेष्ठ व्यासजी, मुनिवर मरीचि, दुर्वासा, अंगिरा, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मुनिराज शरलोम, वात्स्यायन, भरद्वाज, वाल्मीकि, उद्दालक, ऋचीक, शर्याति, च्यवन आदि अनेक वेद ओर वेदांगों के पारंगत, तत्त्वज्ञानी महात्मा विराजमान हुए | वसिष्ठ ओर विश्वामित्रजी के साथ देवर्षि नारद आदि ने जो कि गुरुमुख से विधिपूर्वक सांग वेदों का अध्ययन किये हुए थे, विनय से नतमस्तक श्रीरामचन्द्रजी से यह वाक्य कहा था: बड़े आश्चर्य की बात है कि राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी ने कल्याण गुणों से (कहे जानेवाले उत्तमोत्तम सोलह गुणों से) शोभायमान, वैराग्यरससे परिपूर्ण एवं बड़ी उदार वाणी कही । उक्त वाणी में ये इस प्रकार के ओर ऐसे ही है, यों विचारकर वक्तव्य अर्थ व्यवस्था के साथ निहित हैं, पदार्थो का तत्वबोध भी है अर्थात्‌ केवल कपोलकल्पना से पदार्थो की व्यवस्था नहीं की गई है, अतएव यह विद्वानों की सभा में स्थान पाने योग्य है, इसके वर्ण बिलकुल स्फुट हैं, यह वाणी उत्कृष्ट और विपुलभाव से गम्भीर है, हृदय को आनन्द देनेवाली है, पूज्य महात्माओं के योग्य हे, चित्त की चंचलता आदि दोषों से रहित हैं, जैसे इसके वर्ण स्फुट हैं वैसे ही अर्थ भी स्फुट है, इसके सम्पूर्णं पद व्याकरण के नियमों से संस्कृत है, यह हितकारिणी है, ग्रस्त आदि दोषों से रहित है ओर तृष्णा के विनाश से उत्पन्न सन्तोष की सूचक हे । श्रीरामचन्द्रजी द्वारा उक्त यह वाणी किसको आश्चर्यमग्न नहीं करती ? सैंकड़ों में से किसी एक-आध की ही वाणी सम्पूर्ण वक्ताओं की अपेक्षा सर्वाश में उत्कृष्ट चमत्कार से परिपूर्ण अतएव अभीष्ट (विवक्षित) अर्थ को प्रकट करने में सर्वथा समर्थ होती है राजकुमार, आपके बिना किस पुरुष की विवेकरूपी फल से सुशोभित, कुशाग्र के समान तीव्र प्रज्ञा विचार-वैराग्यरूपी पुष्प-पल्लवों से वृद्धिको प्राप्त होगी ? श्रीरामचन्द्रजी के समान जिसके हृदय में असाधारण रीति से पदार्थों के तत्त्व का प्रकाश करानेवाली या अध्यस्त देह, इन्द्रिय आदि के साम्य से पृथक्‌कृत आत्मा का प्रकाश करानेवाली प्रज्ञारूपी दीपकशिखा (दीपज्योति) प्रज्वलित होती है, वही पुरुष है । और तो पुरुषार्थ के लिए असमर्थ अतएव स्त्रीप्राय हैं । पूर्वोक्त प्रज्ञा से हीन पुरुष रक्त, मांस आदि यन्त्ररूप देहमें आत्मबुद्धि होने से रक्त, मांस, अस्थि आदि यन्त्ररूप ही शब्द, स्पर्श आदि पदार्थो का उपभोग करते हैं, उनमें "सचेतन आत्मा नहीं है यों उनमें चार्वाकता ही सिद्ध होती है, यह भाव है । अथवा यदि उनमें कोई सचेतन होता, तो वह अवश्य पुरुषार्थ के लिए यत्न करता । वे यत्न नहीं करते अतएव वे घट, भित्ति आदि के समान अचेतन ही है ऐसे होने के कारण संसार का विचार नहीं करते, वे निरे पशु हैं; वे पुनःपुनः जन्म, मरण, जरा आदि दुःखों को प्राप्त होते हैं। जैसे शत्रुनाशक श्रीरामचन्द्रजी विमल अन्तःकरणवाले हैँ, वैसे निर्मल अन्तःकरणवाला अतएव पूर्वापर का विचार करनेवाला कहीं पर बड़ी कठिनाई से कोई विरला ही दिखाई देता है । जैसे लोक में उत्कृष्ट माधुर्यवाले फलों से लदे हुए मनोहर आकृतिवाले आमके वृक्ष विरले हैं, वैसे ही उत्कृष्ट माधुर्य से परिपूर्ण तत्त्वसाक्षात्कार से सम्पन्न एवं मनोज्ञ आकृतिवाले महापुरुष विरले ही हैँ । जिससे जगत्‌ का व्यवहार यथार्थरूप से देखा गया है ऐसा केवल स्वविवेक से ही तत््वदर्शनपर्यन्त चमत्कार आदरणीय बुद्धिवाले इसी राजकुमार में इसी अवस्था में देखा जाता है, यह महान्‌ आश्चर्य है । देखने में सुन्दर, सरलता से चढ़ने के योग्य एवं फल फूल और पत्तों से सुशोभित वृक्ष सभी देशो में होते हैं, पर चन्दन के वृक्ष सर्वत्र नहीं होते फल ओर पल्लव से पूर्ण वृक्ष प्रत्येक वन में सदा मिलते हैं, पर अपूर्व चमत्कारवाला लोग का वृक्ष सदा सर्वत्र सुलभ नहीं है । जैसे चन्द्रमा से शीतल चाँदनी उत्पन्न होती है, जैसे सुन्दर वृक्ष से बोर उत्पन्न होते हैं और जैसे फूलों से सुगन्ध परम्परा उत्पन्न होती है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी से यह चमत्कार देखा गया है । हे द्विजश्रेष्ठ, अत्यन्त दुष्टात्मा दैव (पूर्वजन्म के कर्म ) या उसका अनुसरण करनेवाले विधाता की सृष्टि से रचित इस निन्दित संसार में सार पदार्थ अत्यन्त दुर्लभ है। जो यशस्वी लोग सदा तत्त्व के विचार में तत्पर होकर सार पदार्थ की प्राप्ति के लिए यत्न करते हैं, वे ही धन्य हैं, वे ही सज्जनशिरोमणि हैं और वे ही उत्तम पुरुष हैं। तीनों लोकों में श्रीरामचन्द्रजी के सदृश विवेकी एवं उदारचित्त न कोई है और न कोई होगा, ऐसा मेरा निश्चय है