Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 33, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्ता सा समस्तैव व्योमवासनिवासिनी ।
तां पपात सभां तत्र दिव्या मुनिपरम्परा ॥ ४ ॥
अग्रस्थितमनुत्सृष्टरणद्वीणं मुनीश्वरम् ।
पयः पीनघनश्यामं व्यासमेव किलान्तरा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी
ने कहा : सिद्धों के यों कहनेपर विमानों पर रहनेवाले सम्पूर्ण दिव्य मुनिजन उस विशाल सभा में,
जहाँ पर श्रीरामचन्द्र आदि थे, उतरे उनके आगे-आगे वीणा बजा रहे देवर्षि श्रीनारदजी थे और
जल से पूर्ण मेघ के समान श्याम वेदव्यासजी उनके पीछे थे