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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, Verses 10–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, verses 10–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 10-13

संस्कृत श्लोक

अपमृष्टमलोदेति क्षालनेनामृतद्युतिः । मनश्चन्द्रमसः केन तेन कामकलङ्कितात् ॥ १० ॥ दृष्टसंसारगतिना दृष्टादृष्टविनाशिना । केनेव व्यवहर्तव्यं संसारवनवीथिषु ॥ ११ ॥ रागद्वेषमहारोगा भोगपूगा विभूतयः । कथं जन्तुं न बाधन्ते संसारार्णवचारिणम् ॥ १२ ॥ कथं च धीरवर्याग्नौ पततापि न दह्यते । पावके पारदेनेव रसेन रसशालिना ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

महर्षे, काम से कलंकित मनरूपी चन्द्रमा विद्वान जनों द्वारा अनुभूत किस धोवन से (क्षालन से) धोया जाय जिससे कि उससे निर्मल (काम आदि मल से रहित) आनन्दरूपी चाँदनी उदित हो। जिसे संसार की अनर्थकारिता का अनुभव है ओर जो हिक ओर लौकिक भोगो का विवेकजनित वैराग्य ओर दृढ़बोध द्वारा नाश कर चुका है, ऐसे किस महापुरुष की नाई संसाररूपी वनश्रेणी में हमें व्यवहार करना चाहिए कृपया उसका निर्देश कीजिए | भगवन्‌, क्या करने से रागद्वेषरूपी महाव्याधियाँ एवं प्रचु रभोगों से परिपूर्ण दुःखदायिनी सम्पत्तिर्यौ संसाररूपी समुद्र मे विहार करनेवाले प्राणी को क्लेश नहीं देती, कृपया उसे हमसे कहिए। हे धीर श्रेष्ठ ब्रह्मन्‌, जैसे अग्नि में गिरने से भी पारद रस जलता नहीं, वैसे ही अग्नि के तुल्य सन्ताप देनेवाले संसार में पड़नेपर भी ज्ञानामृत से सुशोभित पुरुष किस उपाय का अवलम्बन करने से सन्ताप को प्राप्त नहीं होता, कृपया उसको मुझसे कहिए