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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, Verses 1–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 31, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । प्रोच्चवृक्षचलत्पत्रलम्बाम्बुलवभङ्गुरे । आयुषीशानशीतांशुकलामृदुनि देहके ॥ १ ॥ केदारविरटद्भेककण्ठत्वक्कोणभङ्गुरे । वागुरावलये जन्तोः सुहृत्सुजनसंगमे ॥ २ ॥ वासनावातवलिते कदाशातडिति स्फुटे । मोहोग्रमिहिकामेघे घनं स्फूर्जति गर्जति ॥ ३ ॥ नृत्यत्युत्ताण्डवं चण्डे लोले लोभकलापिनि । सुविकासिनि सास्फोटे ह्यनर्थकुटजद्रुमे ॥ ४ ॥ क्रूरे कृतान्तमार्जारे सर्वभूताखुहारिणि । अश्रान्तस्यन्दसंचारे कुतोऽप्युपरिपातिनि ॥ ५ ॥ क उपायो गतिः का वा का चिन्ता कः समाश्रयः । केनेयमशुभोदर्का न भवेज्जीविताटवी ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अवलम्बन करना चाहिए ? कौन गति है ? किसका स्मरण करना चाहिए ओर किसकी शरण मे जाना चाहिए (=) ? जिससे कि यह जीवनरूपी अरण्य भविष्य में अकल्याणकारी न हो