Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 30, Verses 8–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 30, verses 8–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 8-27
संस्कृत श्लोक
अपहस्तितसर्वार्थमनवस्थितिरास्थिता ।
गृहीत्वोत्सृज्य चात्मानं भवस्थितिरवस्थिता ॥ ८ ॥
चलिताचलितेनान्तरवष्टम्भेन मे मतिः ।
दरिद्रा छिन्नवृक्षस्य मूलेनेव विडम्ब्यते ॥ ९ ॥
चेतश्चञ्चलमाभोगि भुवनान्तर्विहारि च ।
न संभ्रमं जहातीदं स्वविमानमिवामराः ॥ १० ॥
अतोऽतुच्छमनायासमनुपाधि गतभ्रमम् ।
किं तत्स्थितिपदं साधो यत्र शोको न विद्यते ॥ ११ ॥
सर्वारम्भसमारूढाः सुजना जनकादयः ।
व्यवहारपरा एव कथमुत्तमतां गताः ॥ १२ ॥
लग्नेनापि किलाङ्गेषु बहुधा बहुमानद ।
कथं संसारपङ्केन पुमानिह न लिप्यते ॥ १३ ॥
कां दृष्टिं समुपाश्रित्य भवन्तो वीतकल्मषाः ।
महान्तो विचरन्तीह जीवन्मुक्ता महाशयाः ॥ १४ ॥
लोभयन्तो भयायैव विषयाभोगभोगिनः ।
भङ्गुराकारविभवाः कथमायान्ति भव्यताम् ॥ १५ ॥
मोहमातङ्गमृदिता कलङ्ककलितान्तरा ।
परं प्रसादमायाति शेमुषीसरसी कथम् ॥ १६ ॥
संसार एव निवहे जनो व्यवहरन्नपि ।
न बन्धं कथमाप्नोति पद्मपत्रे पयो यथा ॥ १७ ॥
आत्मवत्तृणवच्चेदं सकलं कलयञ्जनः ।
कथमुत्तमतामेति मनोमन्मथमस्पृशन् ॥ १८ ॥
कं महापुरुषं पारमुपायातं महोदधेः ।
आचारेणानुसंस्मृत्य जनो याति न दुःखिताम् ॥ १९ ॥
किं तस्यादुचितं श्रेयः किं तत्स्यादुचितं फलम् ।
वर्तितव्यं च संसारे कथं नामासमञ्जसे ॥ २० ॥
तत्त्वं कथय मे किंचिद्येनास्य जगतः प्रभो ।
वेद्मि पूर्वापरं धातुश्चेष्टितस्यानवस्थितेः ॥ २१ ॥
हृदयाकाशशशिनश्चेतसो मलमार्जनम् ।
यथा मे जायते ब्रह्मंस्तथा निर्विघ्नमाचर ॥ २२ ॥
किमिह स्यादुपादेयं किंवा हेयमथेतरत् ।
कथं विश्रान्तिमायातु चेतश्चपलमद्रिवत् ॥ २३ ॥
केन पावनमन्त्रेण दुःसंसृतिविषूचिका ।
शाम्यतीयमनायासमायासशतकारिणी ॥ २४ ॥
कथं शीतलतामन्तरानन्दतरुमञ्जरीम् ।
पूर्णचन्द्र इवाक्षीणां भृशमासादयाम्यहम् ॥ २५ ॥
प्राप्यान्तः पूर्णतां पूर्णो न शोचामि यथा पुनः ।
सन्तो भवन्तस्तत्त्वज्ञास्तथेहोपदिशन्तु माम् ॥ २६ ॥
अनुत्तमानन्दपदप्रधानविश्रान्तिरिक्तं सततं महात्मन् ।
कदर्थयन्तीह भृशं विकल्पाः श्वानो वने देहमिवाल्पजीवम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
क्लेशदायिनी अपनी उसी अन्तरालावस्था का वर्णन करते हैं।
मेरी उक्त चित्त की अस्थिरता सांसारिक और पारमार्थिक सम्पूर्ण सुखों को गँवाकर स्थित है,
क्योंकि संसारस्थिति आत्मा के विवेकमात्र से अर्थ बोध होने के कारण मुझे आधा छोड़कर आधा पकड़े
हुए है अर्थात् न तो मैं पूर्ण ज्ञानी ही हूँ और न पूरा अज्ञानी ही, इसलिए अन्तराल में स्थित मुझे न ऐहिक
सुख ही प्राप्त है और न पारमार्थिक ही । जैसे कटे हुए वृक्ष के ढूँठ द्वारा (स्थाणु द्वारा) अन्धकार में सत्य
कोटि ओर असत्य कोटिरूप यह ठ है या चोर है, इस प्रकार स्थिरत्व और अस्थिरत्व प्रकार के संशय
से लोगों की बुद्धि वंचित (भ्रमित) होती है वैसे ही आत्मतत्त्व के निश्चय से रहित (आत्मतत्त्वनिश्चय में
सन्देहयुक्त) मेरी बुद्धि भी यह तत्त्व है या यह तत्त्व है, इस प्रकार के सन्देह से वंचित हो रही है। जैसे
देवता विविध भोगसामग्रियों से परिपूर्ण, भुवनों में विहार करनेवाले एवं शीघ्रगामी अपने विमान का
परित्याग नहीं करते वैसे ही स्वभावतः चंचल नानाभोगसामग्रियों से परिपूर्ण भुवनों में परिभ्रमण से
अधिक चपलता को प्राप्त मेरा मन भी चंचलता को नहीं छोड़ता है । मैं उसे जबरदस्ती रोकना चाहता
हूँ, पर तत्त्वज्ञान न होने के कारण मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ । इसलिए हे मुनिनायक, परमार्थ सत्य,
जन्म-मरण आदि दुःखों से शून्य, देहादि उपाधि से विरहित, भ्रम से रहित वह विश्रान्ति-स्थान कौन
है, जिसे प्राप्त कर शोक नहीं होता । हमारे ही समान दृष्ट और अदृष्टरूप फलदायक सम्पूर्ण कर्मो के
अनुष्ठाता एवं लौकिक व्यवहार में तत्पर जनक आदि महापुरुष कैसे उत्तम पद को प्राप्त हुए ? हे
परसत्कारकारिन्, इस संसार में वह कौनसा उपाय है, जिससे कि संसाररूपी पंक अर्थात् पुण्य-
पापरूपी पंक का या शोकमोहरूप पंक का अनेक बार शरीर से सम्पर्क होने पर भी मनुष्य उससे लिप्त
नहीं होता ? महामहिमाशाली, वीतराग एवं जीवन्मुक्त आप लोग किस दृष्टि का अवलम्बन कर इस
संसार में विचरते हैं प्राणियों को भयभीत करने के लिए लुभा रहे नश्वर (& ) विषय सर्पो के सदृश हैं,
भला वे कल्याणकारी कैसे हो सकते हैं ? मोहरूपी हाथी द्वारा विलोडित, काम आदिरूपी कीचड़ और
सेवाल से व्याप्त प्रज्ञारूपी तालाब किस प्रकार अत्यन्त निर्मलता को प्राप्त हो ? जैसे कमल के पत्ते से
जल का सम्पर्क नहीं होता, वैसे ही संसारप्रवाह में व्यवहार करनेपर भी पुरुष बन्धन को प्राप्त न हो,
इसका क्या उपाय है ? इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को तत्त्वदृष्टि से आत्मा के समान और बाहयदृष्टि से तृण
के समान देख रहे एवं कामादि वृत्तियों का स्पर्श न कर रहे पुरुष कैसे श्रेष्ठता को प्राप्त होते हैं जिसने
अज्ञानरूपी महासागर पार कर लिया है, ऐसे किस महापुरुष के चरित्र का स्मरणपूर्वक आचरण कर
मनुष्य दुःखी नहीं होता ? अविनाशी होने के कारण प्राप्त करने के योग्य मोक्ष क्या है और कर्म उपासना
आदि का उचित फल क्या है ? भला बतलाइए तो सही, इस विषम संसार में कैसे व्यवहार करना
भ "रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते“ (परमात्मा का साक्षात्कार कर इसका रस भी निवृत्त हो जाता
है) इस भगवद्वचन के अनुसार परमात्मादर्शन के बिना रस की निवृत्ति नहीं हो सकती
& मूलस्थित “भंगुराकारविभवाः” का विषयपक्ष में विनाशशील आधार और विभववाले और
सर्पपक्ष में कुटिक आकार और विषशक्ति से युक्त, यह अर्थ है।
चाहिए ? प्रभो, मुझे तत्त्व का उपदेश दीजिये, जिससे मैं अव्यवस्थित ब्रह्मा की कृति जगत् की पूर्वापर
वस्तु जानूं अर्थात् जगत् के आदि और अन्त में अवशिष्ट रहनेवाला पारमार्थिक तत्त्व जानूँ। ब्रह्मन्
जैसे मेरे हृदयरूपी आकाश के चन्द्ररूप साभार अन्तःकरण का मल (अज्ञान) हट जाय वैसा प्रयत्न
आप निशंक होकर कीजिये । इस संसार में कौन वस्तु उपादेय (प्राप्त करने योग्य) है, कौन वस्तु
अनुपादेय है और कोन वस्तु न उपादेय है और न अनुपादेय हे । यह चंचल चित्त कैसे पर्वत के समान
स्थिरता (शान्ति) को प्राप्त हो ? सैकड़ों क्लेशो की सृष्टि करनेवाली यह निन्दित संसाररूपी महामारी
किस पवित्रतम मन्त्र से अनायास शान्ति को प्राप्त हो ? जैसे पूर्ण चन्द्रमा अत्यन्त आनन्द देनेवाली
शीतलता को प्राप्त करता है, वैसे ही मेँ भी आनन्दरूपी वृक्ष की मंजरीरूप देशपरिच्छेद ओर
कालपरिच्छेद से शून्य शीतलता को अपने हृदय में कैसे प्राप्त करूं ? भगवन्, आप तत्त्वज्ञ ओर
सज्जनशिरोमणि हैं, इसलिए अपने मे पूर्णता को प्राप्त कर पूर्ण हुआ मैं जैसे इस लोक में फिर शोक को
प्राप्त होऊँ वैसा आप मुझे उपदेश दीजिये । महात्मन् जैसे वन में कुत्ते स्वल्प बल से युक्त जीवों की
(क्षुद्र प्राणियों की) देह को अति पीड़ित करते हैं, वैसे ही विविध संशय सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय ब्रह्मपद
में आत्यन्तिक स्थिरता से रहित पुरुष को सदा अति पीड़ित करते हैं