Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, Verses 15–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

गन्धर्वनगराकारविपर्यासविधायिनी । अपाङ्गभङ्गुरोदारव्यवहारमनोरमा ॥ १५ ॥ तडित्तरलमालोकमातन्वाना पुनःपुनः । संसाररचना राजन्नृत्तसक्तेव राजते ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, कटाक्षदर्शन के समान क्षणभंगुर व्यवहारपरम्परा से मनोहर यह संसाररचना कटाक्षपात और क्षणभंगुर नई नई कारीगरियों से मनोहर नृत्तासक्त नटी के समान अद्भुत गन्धर्वनगर के सदृश अनेक भ्रम उत्पन्न करती है और यह पुनः पुनः बिजलीरूप चंचल दृष्टि को फैलाती है अर्थात्‌ जैसे ऐन्द्रजालिक स्त्री तन्त्र और मन्त्रों के विस्तार द्वारा लोगों के नयनों की दर्शनशक्ति को आच्छादित कर अवस्तु में वस्तु ज्ञान उत्पन्न कराती है, यह संसाररचनारूपी नर्तकी की दृष्टि भी वैसे ही बिजली से भी चंचल है अतएव यह नृतासक्त संसार रचना नृतासक्त नटी के समान है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है