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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, Verses 1–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 28, verses 1–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 1-14

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । यच्चेदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजंगमम् । तत्सर्वमस्थिरं ब्रह्मन्स्वप्नसंगमसंनिभम् ॥ १ ॥ शुष्कसागरसंकाशो निखातो योऽद्य दृश्यते । स प्रातरभ्रसंवीतो नगः संपद्यते मुने ॥ २ ॥ यो वनव्यूहविस्तीर्णो विलीढगगनो महान् । दिनैरेव स यात्युर्वीसमतां कूपतां च वा ॥ ३ ॥ यदङ्गमद्य संवीतं कौशेयस्रग्विलेपनैः । दिगम्बरं तदेव श्वो दूरे विशरिताऽवटे ॥ ४ ॥ यत्राद्य नगरं दृष्टं विचित्राचारचञ्चलम् । तत्रैवोदेति दिवसैः संशून्यारण्यधर्मता ॥ ५ ॥ यः पुमानद्य तेजस्वी मण्डलान्यधितिष्ठति । स भस्मकूटतां राजन्दिवसैरधिगच्छति ॥ ६ ॥ अरण्यानी महाभीमा या नभोमण्डलोपमा । पताकाच्छादिताकाशा सैव संपद्यते पुरी ॥ ७ ॥ या लतावलिता भीमा भात्यद्य विपिनावली । दिवसैरेव सा याति पुनर्मरुमहीपदम् ॥ ८ ॥ सलिलं स्थलतां याति स्थलीभवति वारिभूः । विपर्यस्यति सर्वं हि सकाष्ठाम्बुतृणं जगत् ॥ ९ ॥ अनित्यं यौवनं बाल्यं शरीरं द्रव्यसंचयाः । भावाद्भावान्तरं यान्ति तरङ्गवदनारतम् ॥ १० ॥ वातान्तर्दीपकशिखालोलं जगति जीवितम् । तडित्स्फुरणसंकाशा पदार्थश्रीर्जगत्र्त्रये ॥ ११ ॥ विपर्यासमियं याति भूरिभूतपरम्परा । बीजराशिरिवाजस्रं पूर्यमाणः पुनःपुनः ॥ १२ ॥ मनःपवनपर्यस्तभूरिभूतरजःपटा । पातोत्पातपरावर्तपराभिनयभूषिता ॥ १३ ॥ आलक्ष्यते स्थितिरियं जागती जनितभ्रमा । नृत्तावेशविवृत्तेव संसारारभटीनटी ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

मनुष्यों की चहल-पहल से परिपूर्ण नगर दिखाई देता है, कुछ ही दिनों के बाद वहीं पर सूना अरण्य बन जाता है । जो पुरुष आज तेजस्वी है, अनेक सामन्तो पर शासन करता है, वही कुछ ही दिनों के बाद भस्मराशि (राख की ठेरी) बन जाता हे । आज जो महाअरण्य विस्तार ओर नीलता में आकाशमण्डल को मात करता हे, अर्थात्‌ आकाश के समान विशाल ओर गहन होने के कारण आकाश के समान काला है, वही थोड़े दिनों में पताकाओं से आकाश को पाट देनेवाला महानगर बन जाता है । आज जो लताओं से वेष्टित अतएव भयंकर वनश्रेणी दिखाई देती है, वही थोड़े ही दिनो मेँ जल और वृक्षों से शून्य मरूभूमि (रेगिस्तान) बन जाती है । जहाँ पर अगाध जल भरा रहता है, वे बड़े-बड़े तालाब और समुद्र, स्थल बन जाते हैं और स्थल जलाशय बन जाता है, बहुत कहाँ तक कहें, काष्ठ, जल और तृणों से युक्त यह सारा-का-सारा जगत्‌ विपरीत अवस्थाको प्राप्त होता है । युवावस्था, बाल्यावस्था, शरीर और धनसम्पत्ति ये सब-के-सब अनित्य हैँ । जैसे तरंग लगातार जल से तरंगरूपता को और तरंग से जलरूपता को प्राप्त होती है वैसे ही सब पदार्थ निरन्तर अपने पूर्व स्वभाव से अन्य स्वभाव को प्राप्त होते हैं। इस संसार में जीवन प्रखर वायु से पूर्ण स्थान में रक्खे हुए दीपक की लौ के समान अत्यन्त चंचल है और तीनों लोकों के सम्पूर्णं पदार्थो की चमक-दमक बिजली की चमकके सदृश क्षणिक है। जैसे भंडार घर में पुनःपुन भरने पर भी धान, गेहूँ आदि अन्नो की राशि प्रतिदिन के व्यय से रिक्त हो जाती है या खेत में बोई गई और पानी से सींची जाती हुई धान्यराशि अंकुर ओर पौधे के रूप से विपरीत अवस्था को प्राप्त होती है, वैसे ही ये विविध पदार्थ विपरीत अवस्था (परिवर्तन) को प्राप्त होते हैं। अतिशय आडम्बर से शोभित होनेवाली संसाररचना अत्यन्त कौशलपूर्ण नटी के समान है। यह नर्तक के आवेश में नटी के समान अपना अतिशय नृत्य कौशल प्रकट करने के लिए अंगपरिवर्तन द्वारा पद पद में भ्रम उत्पन्न करती है। मनरूपी वायु से परिचालित जीवरूप धूलि ही इस संसाररचनारूपी नर्तकी के वस्त्र हैं और प्राणियों को नरक में गिराना, स्वर्ग में पहुँचाना और पुनः इसी लोक में वापिस लाना ही इसके उत्तम अभिनय है, उनसे यह विभूषित है