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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, Verses 29–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, verses 29–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 29-32

संस्कृत श्लोक

व्यवहारमहावर्ता सुखदुःखपरम्परा । रजःपूर्णतमःश्यामा रोमाली तस्य राजते ॥ २९ ॥ एवंप्रायः स कल्पान्ते कृतान्तस्ताण्डवोद्भवाम् । उपसंहृत्य नृत्येहां सृष्ट्वा सह महेश्वरम् ॥ ३० ॥ पुनर्लास्यमयीं नृत्यलीलां सर्गस्वरूपिणीम् । तनोतीमां जराशोकदुःखाभिभवभूषिताम् ॥ ३१ ॥ भूयः करोति भुवनानि वनान्तराणि लोकान्तराणि जनजालककल्पनां च । आचारचारुकलनामचलां चलां च पङ्काद्यथार्भकजनो रचनामखिन्नः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य लोगों के कंकणों में निर्जीव मछलियों की आकृति बनाई जाती है, पर इसके कंकणरूपी समुद्रो मे सजीव मछलियाँ विद्यमान है, यह भाव है। शास्त्रीय और स्वाभाविक व्यवहाररूप आवर्तं से (भँवर से) युक्त, रजोगुण पूर्ण तमोगुण से काली सुख-दुःखपरम्परा उसकी रोमावली के रूप में विराजमान हैं । इस प्रकार का वह कृतान्त प्रलयकाल में ताण्डव को उत्पन्न करनेवाली नृत्येच्छा (नाचने की इच्छा) का परित्याग करता है, अर्थात्‌ उक्त नृत्यचेष्टा से विरत होकर चिरकाल तक विश्राम करता हे । तदनन्तर ब्रह्मा आदि के साथ भूतो की फिर सृष्टि कर पुनः नृत्यलीला का विस्तार करता हे । उसकी उक्त नृत्यलीला अंग-प्रत्यंग के अभिनय से पूर्ण है और वृद्धता, शोक, दुःख ओर तिरस्कार उसके आभूषण हैँ । जैसे बालक गीली मिट्टी को लेकर नाना प्रकार के खिलौने आदि बनाता हे और थोडी देर में उन्हें नष्ट -भ्रष्ट कर देता हे, वैसे ही काल भी आलस्य रहित होकर चौदह भुवन, विविध देश, वन ओर असंख्य तथा विविध जीव ओर उनके सुन्दर श्रौतस्मार्तादिरूप आचार-विचारों की सृष्टि कर फिर उन्हें नष्ट कर देता हे उक्त आचार-विचार सत्ययुग ओर त्रेतायुग मेँ निश्चल रहते हैं तथा कलियुग ओर द्वापरयुग में चल है