Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, Verses 22–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, verses 22–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 22-28
संस्कृत श्लोक
नृत्यतोऽन्तः कृतान्तस्य चन्द्रमण्डलभासिनः ।
तारकाचन्द्रिकाचारुव्योमपिच्छावचूलिनः ॥ २२ ॥
एकस्मिञ्छ्रवणे दीप्ता हिमवानस्थिमुद्रिका ।
अपरे च महामेरुः कान्ता काञ्चनकर्णिका ॥ २३ ॥
अत्रैव कुण्डले लोले चन्द्रार्कौ गण्डमण्डले ।
लोकालोकाचलश्रेणी सर्वतः कटिमेखला ॥ २४ ॥
इतश्चेतश्च गच्छन्ती विद्युद्वलयकर्णिका ।
अनिलान्दोलिता भाति नीरदांशुकपट्टिका ॥ २५ ॥
मुसलैः पट्टिशैः प्रासैः शूलैस्तोमरमुद्गरैः ।
तीक्ष्णैः क्षीणजगद्वान्तकृतान्तैरिव संभृतैः ॥ २६ ॥
संसारबन्धनादीर्घे पाशे कालकरच्युते ।
शेषभोगमहासूत्रप्रोते मालास्य शोभते ॥ २७ ॥
जीवोल्लसन्मकरिकारत्नतेजोभिरुज्ज्वला ।
सप्ताब्धिकङ्कणश्रेणी भुजयोरस्य भूषणम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
नियति देवी के नृत्य और नृत्य की सामग्री का वर्णन कर उसके पति के भी नृत्य का वर्णन करते हुए
उसके भूषणो को कहते है ।
& यहाँ पर काल के ललाट और पैर-इन आदि और अन्त अंगों की भूषणकल्पना का ही वर्णन
किया गया है, इसीसे उसके शरीर के अन्य अवयवो की भूषणकल्पना का भी यथायोग्य स्वयं अनुमान
कर लेना चाहिये |
(0) अन्य देहियों के शरीरो में नौ छिद्र प्रसिद्ध है, परंतु इन्द्र सहस्रक्ष (हजार नेत्रवाले) हैँ । उनके
शरीर मेँ एक हजार छिद्र तो नेत्रो के हैँ तथा सात छिद्र और हैं, इस प्रकार नौ छिद्रवाले प्रसिद्ध अन्य
शरीरो से एक हजार सात छिद्रवाला इन्द्र का शरीर विलक्षण है ।
पूर्वोक्त नृत्यशाला के अन्दर नियति देवी का पति कृतान्त नृत्य करता है | कुण्डलभूत चन्द्रमण्डल
से वह अति शोभित है और उसके केश तारे और चाँदनी से मनोहर आकाशरूपी पिच्छ से (मोरपंख से)
अलंकृत है। उसके दाहिने कान में हिमालयरूपी हड्डी का बना अँगूठी के आकार का चमकदार कुण्डल
है और बाँए कान में महान् सुमेरु पर्वत ही सोने का सुन्दर कुण्डल हे । उसके चन्द्रमा और सूर्य ही उक्त
दोनों ही कानों में गालों की शोभा को बढ़ानेवाले चंचल कुण्डल हैं। लोकालोकाचल पर्वत की श्रेणी
उसकी कमर के चारों ओर लगी हई मेखला (करधनी) है । बिजली उसके हाथ का गोलाकार कंकण है
और वह नृत्य के समय कभी इधर कभी उधर सरकता है। मेघ ही उसके रंग-बिरंग के वस्त्रो के टुकड़ों
से बनी हुई कन्था है और वह वायु से सदा हिलती-डुलती हुई शोभित होती है । इसके गले मे मुसल,
पट्टिश, प्रास, शूल, तोमर और मुद्गरो से बनी हुई माला शोभा पा रही है, वे मूसल आदि ऐसे तीकण हैं
कि मानों पूर्व-पूर्व की जितनी सृष्टियाँ नष्ट हुई थी, उनसे निकले हुए मृत्यु ही इकडे हो गये हों । यह
माला शेषनाग के शरीररूपी महारस्सी से बधे हुए, पूर्वोक्त राजपुत्ररूप काल के हाथ से गिरे हुए और
जन्म-मरणशील जीवरूपी मृगों के बन्धन के लिए बिछाए गये जाल में गुँथी हुई है । सात समुद्रों की
श्रेणी ही इसके बाहुओं के कंकण हैं, वे रत्नों की कान्ति से खूब चमकते हैं और सजीव मछलियाँ उनमें
विद्यमान हैं