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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 25

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त पचीसवाँ सर्ग कर्म और कर्मफलरूप दूसरे काल के अद्भुत नृत्यों का वर्णन ।

8 verse-groups

  1. Verse 1इस प्रकार महाकाल का राजपुत्र के रूपक द्वारा वर्णन कर उसके उपाधिभूत कर्मरूप काल का, उसके म…
  2. Verses 2–4सूचीकटाह न्याय से पहले दूसरे का वर्णन करते हैं। मुनिश्रेष्ठ, स्वकर्मरूपी जिसका फलसिद्धि क…
  3. Verse 5उक्त दो कालो में से प्रथम केवल शास्त्र से ही जाना जा सकता है, उस पर विश्वास दढ करने के लि…
  4. Verse 6किये हुए कर्मों के फल की अवश्यम्भावितारूप नियम में बड़ा अनुराग है। यह किये हुए कर्मों का…
  5. Verses 7–13उसके हस्ताभरण हैं और सुमेरू पर्वत उसके हाथ में स्थित लीलाकमल है। प्रलयकाल के सागर में धोय…
  6. Verses 14–21चित्रगुप्त प्राणियों के कर्मरूपी सुगन्ध को प्रकट करता है, अतः वह कस्तूरीस्वरूप है। उक्त क…
  7. Verses 22–28नियति देवी के नृत्य और नृत्य की सामग्री का वर्णन कर उसके पति के भी नृत्य का वर्णन करते हु…
  8. Verses 29–32अन्य लोगों के कंकणों में निर्जीव मछलियों की आकृति बनाई जाती है, पर इसके कंकणरूपी समुद्रो…