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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verses 20–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

मह्यं च भगवन्ब्रूहि कथं संसारसंकटे । रामो व्यवहृतो ह्यस्मिन्भरतश्च महामनाः ॥ २० ॥ शत्रुघ्नो लक्ष्मणश्चापि सीता चापि यशस्विनी । रामानुयायिनस्ते वा मन्त्रिपुत्रा महाधियः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

(पूर्वरामायण वित्तशुद्धिजनक होने के कारण लोकहितकारी है, उत्तररामायण मुक्तिप्रद होने के कारण लोकहितकारी है, इसलिए लोक हितार्थत्व दोनों में समान है ।) भगवन्‌ ! इस विषय में मेरी भी एक प्रार्थना है कि महामना रामचन्द्रजी, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, यशस्विनी सीता, महाबुद्धि रामानुयायी मन्त्रिपत्र आदि अन्यान्य परिवार के लोगों ने इस संसारसंकट में किस प्रकार व्यवहार किया ? उसको कहिये । उन लोगों ने अज्ञानी जीव की तरह शोकयुक्त होकर कालयापन किया था या वे मुक्त जीव की तरह असंग रहे थे २