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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

किमेतद्ब्रह्मणा प्रोक्तं भरद्वाज वदाशु मे । इत्युक्तेन पुनः प्रोक्तं भरद्वाजेन तेन मे ॥ १८ ॥ भरद्वाज उवाच । एतदुक्तं भगवता यथा रामायणं कुरु । सर्वलोकहितार्थाय संसारार्णवतारकम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

वत्स भरद्वाज, ब्रह्माजी ने यह क्या कहा ? उसे मुझसे शीघ्र कहो । मेरे यों पूछने पर भरद्वाज ने मुझसे फिर कहा : महर्षे, भगवान्‌ ब्रह्मा ने कहा कि आपने जैसे पहले चित्त को विशुद्ध करनेवाले रामायण की रचना की, इस समय भी वैसे ही सब लोगों के हित के लिए संसाररूपी समुद्र से तारने के लिए नौकारूप उत्तर रामायण की रचना कीजिए