Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
वाल्मीकिरुवाच ।
शापव्याजवशादेव राजवेषधरो हरिः ।
आहृताज्ञानसंपन्नः किंचिज्ज्ञोऽसौ भवत्प्रभुः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
(५) वसिष्ठ और राम के संवाद से यह सूचित होता है कि वसिष्ठ ने रामचन्द्रजी को उपदेश दिया
था। वसिष्ठ गुरु थे ओर राम उनके शिष्य । इस कथा ने राजर्षि के मन में सन्देह उत्पन्न कर दिया कि
अज्ञ जीव ही ज्ञान-प्राप्ति के लिए शिष्य होता है, किन्तु राम स्वयं सनातन ब्रह्म थे, वे क्यों शिष्य होंगे ?
वे कौन राम थे, क्या वे राम नाम के कोई जीव थे ? या भगवान् के अवतार प्रसिद्ध राम थे, ऐसा सन्देह
होने पर राजर्षि ने महर्षि से जिज्ञासा की कि आप किस राम की कथा कहेंगे उसे मुझसे किये ।
वाल्मीकिजी ने कहा : निग्रहानुग्रहसमर्थ भगवान् श्रीहरिने शाप पालन के बहाने राजा के वेश में अवतार
लिया था। वे सर्वज्ञ होने पर भी अपने भक्तों के वाक्यों को सत्य करने की इच्छा से साधारण मनुष्यों की
भाँति अज्ञ हो गये थे