Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 40–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 40–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 40-42
संस्कृत श्लोक
इति श्रुत्वा वचो भद्रे स राजा प्रत्यभाषत ।
राजोवाच ।
नेच्छामि देवदूताहं स्वर्गमीदृग्विधं फलम् ॥ ४० ॥
अतः परं महोग्रं च तपः कृत्वा कलेवरम् ।
त्यक्ष्याम्यहमशुद्धं हि जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥ ४१ ॥
देवदूत विमानेदं गृहीत्वा त्वं यथागतः ।
तथा गच्छ महेन्द्रस्य संनिधौ त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वर्ग के ये ही गुण ओर दोषों को सुनकर महाराज बोले : देवदूत, मेँ
ऐसे स्वर्ग-भोग की इच्छा नहीं करता । जैसे साँप पुरानी केंचुली को छोड देता है, वैसे ही मैं आज से
महाउग्र तप करके इस घृणास्पद शरीर को छोड दगा । हे देवदूत, आप इस विमान को लेकर देवराज
इन्द्र के समीप जैसे आये थे वैसे वापिस चले जाइये, आपको नमस्कार हे