Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 36–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 36-39
संस्कृत श्लोक
दूत उवाच ।
स्वर्गे पुण्यस्य सामग्र्या भुज्यते परमं सुखम् ।
उत्तमेन तु पुण्येन प्राप्नोति स्वर्गमुत्तमम् ॥ ३६ ॥
मध्यमेन तथा मध्यः स्वर्गो भवति नान्यथा ।
कनिष्ठेन तु पुण्येन स्वर्गो भवति तादृशः ॥ ३७ ॥
परोत्कर्षासहिष्णुत्वं स्पर्धा चैव समैश्च तैः ।
कनिष्ठेषु च संतोषो यावत्पुण्यक्षयो भवेत् ॥ ३८ ॥
क्षीणे पुण्ये विशन्त्येतं मर्त्यलोकं च मानवाः ।
इत्यादिगुणदोषाश्च स्वर्गे राजन्नवस्थिताः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
देवदूत ने कहा : राजन्, पुण्य की सामग्री के अनुसार मनुष्य स्वर्ग
में उत्तम फल भोगता हे । उत्कृष्ट पुण्य से उत्कृष्ट स्वर्ग मिलता है, मध्यम पुण्य से मध्यम स्वर्ग मिलता
है एवं कनिष्ठ पुण्य से तदनुरूप कनिष्ठ ही फलभोग मिलता हे । इसमें हेरफेर नहीं होता महाशय, पुण्य
के तारतम्य के अनुसार स्वर्ग-स्थान और वहाँ के सुख का तारतम्य (उत्कर्ष ओर अपकर्ष) होता हे ।
जिन्हें उत्तम स्वर्ग प्राप्त नहीं है, उनको उत्तम स्वर्गवालों की उत्कृष्टता असह् प्रतीत होती है, समान
स्वर्गवाले एक दूसरे के साथ ईर्ष्या, स्पर्धा, विद्वेष आदि करते हैं और उत्तम स्वर्गवाले अपनी अपेक्षा हीन
स्वर्गवालोँ की हीनता अर्थात् अल्प सुख देखकर सन्तोष करते हैं । जब तक पुण्य क्षय नहीं होता, तब
तक स्वर्गवासी यों उत्तम, मध्यम ओर अधम सुख का अनुभव करते काल-यापन करते हैं । तदनन्तर
पुण्यों के क्षीण होने पर इसी मनुष्य-लोक में आकर जन्म ग्रहण करते हैं । महाराज स्वर्ग में ये ही गुण
ओर दोष विद्यमान हैं