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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

स्फुरन्ति सीकरा यस्मादानन्दस्याम्बरेऽवनौ । सर्वेषां जीवनं तस्मै ब्रह्मानन्दात्मने नमः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

(7) (अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इस जीवरूप आत्मा से प्रवेशकर जगत्‌ की रचना करता हँ । इस श्रुति के अनुसार बिम्बभूत कूटस्थ चैतन्य ही प्रतिबिम्बरूप से अन्तःकरणरूप इस प्रकार "तत्‌" और त्वम्‌“ पदार्थ का शोधन करके तटस्थ लक्षण में पर्यवसित होनेवाले (आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्‌" इत्यादि श्रुति से निर्दिष्ट निरतिशय आनन्दरूप परमपुरुषाथभूत अखण्ड वाक्यार्थ को नमस्कार करते हैं। जिस प्रत्यागात्मस्वरूप परिपूर्ण निरतिशयानन्द-महासमुद्र से स्वर्ग आदि लोकों मे अर्थात्‌ देवताओं में ओर भूमि में अर्थात्‌ चेतन -अचेतन सम्पूर्णं पदार्थो में न्यूनाधिकभाव से आनन्दलेश का अनुभव होता है ओर वास्तव में जिसका आनन्दलेश जीवों का जीवन (आत्मा) है, उस परमपुरुषार्थभूत ब्रह्मानन्द को नमस्कार है