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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

यतः सर्वाणि भूतानिप्रतिभान्ति स्थितानि च । यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मैसत्यात्मने नमः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

॥ श्री गणेशाय नमः ॥ आदिकवि श्रीमद्वाल्मीकिमहाभुनिप्रणीत श्री योगवासिष्ठ महारामायण परमहंस श्रीमद्‌ आनंद बोधेन्द्र सरस्वती प्रणीत "वासिष्ठ महारामायण' (तात्पर्यप्रकाशाख्यव्याख्यासहित) का हिन्दी अनुवाद वैराग्य प्रकरण पहला सर्गं सम्प्रदाय की विशुद्धि के लिए ऋषि-देव संवाद ओर उपोद्घात के लिए श्रीरामचन्द्रजी के अज्ञान के निमित्त का वर्णन । अनादि महामोहरूपी निशा में सोये हुए इस जगत्‌ को बारबार दुःखरूपी भमो से रचित; जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु, हर्ष, शोक, क्रोध आदि अनर्थो से व्याप्तः आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीन तापरूपी दावानल से (वन की अग्नि से) चारों ओर धिरे हुए संसाररूपी महारण्य में मोहित, विवेकरहित और प्रबोध के उपाय के न मिलने के कारण दुःखी देखकर शास्त्ररूपी सूर्य के उदय से उसे (जगत्‌ को) प्रबोधित करने के लिए भगवान श्रीब्रह्मदेव के आदेश से तथा अपने आप भी प्रवृत्त परमदयालु महर्षि श्रीवाल्मीकिजी रवे जानेवाले विशाल शास्त्र की, योगवासतिष्ठ ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति एवं विशेषरूप से प्रचार के लिये श्रुति, स्मृति ओर सदाचार से प्राप्त तथा सम्पूर्ण विघ्नो के निर्मूलन में समर्थ सत्‌, चित्‌ एवं आनन्दस्वरूप अद्वितीय परब्रह्म परमात्मा का प्रणामरूप मंगलाचरण करते हुए शास्त्र के विषय और प्रयोजन को तटस्थलक्षण और स्वरूपलक्षण द्वारा संक्षेप से दिखलाने के लिए पहले “यतो वा“ इस श्रृति से प्रतिपादित तटस्थलक्षणसिद्ध तत्पदार्थं परह्य को नमस्कार करते हैं। सृष्टि के आरम्भ में आकाश आदि महाभूत एवं घट, पट आदि भौतिक पदार्थ जिस अद्वितीय वस्तु की सत्ता से अस्तित्व को प्राप्त कर आविर्भूत होते हैं, स्थितिकाल में जिसकी सत्ता से ही स्थित रहते हैं और प्रलयकाल में जिसमें लीन होते हैं उस सत्यस्वरूप (अपने में आरोपित सम्पूर्ण पदार्थों के पारमार्थिक स्वरूप एवं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मरूप) परमात्मा को नमस्कार है