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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 203 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

अवतंसे जगल्लक्ष्म्यास्त्रिलोकीकर्णकुण्डले । अन्तर्लीनस्फुरत्तारारत्नराजिविराजिते ॥ ९ ॥ दिग्वधूभिर्बृहच्छृङ्गपाणिभिर्मुकुरेष्विव । धृतेषु तापभिन्नेषु महाभ्रेषु निरम्बुषु ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

कभी खेदवान्‌ न होने के लिए मैं आनन्दित हू, चिरकाल के लिए मैं सुखी हूँ, कभी अस्त न होने के लिए मैं स्थित हूँ, मेरे परमपुरुषार्थ का उदय आविर्भूत हो गया हे । अहा पवित्रतम शीतल ज्ञानरूपीजल से आपने मुझको सींचा हे । अतएव मैं हृदय में शरत्काल के कमल के समान प्रहृष्ट ह, विकसित हूँ