Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 203 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । इत्थं विचारपरयोर्मुनिराघवयोस्तयोः । भास्करः श्रवणायेव व्योममध्यमुपाययौ ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

हे सौभाग्यशाली राघव, आप सरीखे महापुरुष कुलदीपक से युक्त पुत्र-पौत्र, सेवक, बन्धुबान्धव, पैदल सिपाही, रथ, गज और अश्वसमुदाय के साथ सब रघुवंशी शरीर में नीरोग, निर्भय और घरों में सदा उदयवाले हों ॥३ ६॥ दो सौ एकर सर्गे माप्त दो यो दोवाँ सर्ग प्रबोध से यों हर्षित हुए राजाओं का तथा प्रबोध से हर्षित हुए श्रीरामचन्द्रजी का वर्णन तथा श्रीरामचन्द्रजी द्वारा ज्ञाननिर्मल अपनी स्थिति का वर्णन । वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज, सभा में वसिष्ठजी का यह वचन सुनकर सब राजा तथा अन्यान्य लोग अमृतप्रवाह से सींचे हुए की तरह अन्दर अत्यन्त शीतलता को प्राप्त हुए