Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 55–56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, verses 55–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 55,56
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हे विभो, जसे कुमुद ब्रह्मसदृश आकाश
में विस्तारित तथा परमामृत से शीतल चन्द्रमा की दीप्ति से विकसित होते हैं वैसे ही हम लोग परम
ब्रह्म मे विस्तारित परमामृतशीतल आपकी वाणी से विकसित हुए हैं | ये हम लोग सकल प्राणियों
को महाबोध देनेवाले मुनिश्रेष्ठ आप गुरु को ही प्रणाम करते हैं, किसी अगुरु को नहीं । इससे
अपराविद्या के गुरुओ की अपेक्षा पराविद्याप्रद गुरु के उत्कर्ष की पराकाष्ठा सूचित की गई