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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 38–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, verses 38–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 38-52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : महाराज दशरथ के यह कह चुकने के वाद गुरु के चरणों पर पुष्पांजलि अर्पित कर रहे श्रीरामचन्द्रजी ने महागुरु श्रीवसिष्ठजी के आगे नतमस्तक होकर यह वाक्य कहा : हे ब्रह्मन्‌, आपने महाराज को निरुत्तर कर दिया है । मेरे पास प्रणाम को छोडकर अन्य उत्तम दातव्य वस्तु नहीं है अतएव हे प्रभो, केवल सारभूतवस्तुवाला मैं राम आपके इस चरणों में प्रणाममात्र करता हू । यह कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने जैसे वन पर्वत के पादां पर (अधोदेशवर्ती छोटे पर्वतो पर) पल्लवो मे लगी हुई ओस की बूँदों को अर्पण करता है वैसे ही शिरसे वन्दना करते हुए वसिष्ठजी के चरणों पर पुष्पांजलि अर्पण की । आनन्दजनित अश्रुधारा से नीतिज्ञ श्रीरामचन्द्रजी का वदन भर गया उन्होंने परम भक्ति से बार-बार श्रीगुरुजी को प्रणाम किया । शत्रुघ्न और लक्ष्मण तथा भरत के तुल्य और जो रामचन्द्रजी के अन्यान्य सहचर निकट स्थित थे उन्होने भी वैसे ही मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी को प्रणाम किया । जो मुनि, राजा या राजकुमार लोग दूर- दूर बैठे थे, उन्होंने दूरस्थं के योग्य प्रणामो तथा पुष्पांजलियों द्वारा मुनिवर श्रीवसिष्ठजी को प्रणाम किया । इस अवसर पर वहाँ पुष्पांजलियों की वर्षाओं से मुनिमहाराज वैसे ही आच्छादित हो गये जैसे कि हिमवृष्टि से पर्वतराज हिमालय आच्छन्न होता है । इसके उपरान्त जब सभा का कोलाहल और प्रणामपरम्परा समाप्त हो चुकीं तब वसिष्ठजी ने माननीय मुनियों के उन्मुख स्वकृत उपदेशात्मक शास्त्रीय सत्य वस्तु के विषय में बुद्धिमालिन्य के कारण यह सदोष है अथवा स्वच्छ बुद्धि के कारण यह निर्दोष है यों सन्देह करते हुए से अपने चरित्र से लोगों को विनय सिखाने के लिए मुनियों से आगे वर्णन किया जा रहे प्रकार से कुछ प्रष्टव्य का स्मरण करते हुए जैसे सफेद बादलों को फाडकर चन्द्रमा अपना मुख दिखाता है वैसे ही उस पुष्पराशि को बाहुओं से हटाकर अपना मुख दिखलाया। जब सिद्धो की वाणियाँ, नगाड़ों की ध्वनियाँ, आकाश से पुष्पवृष्टिर्यो तथा सभा का कोलाहल शान्त हो गया एवं प्रणाम करने के उपरान्त अपना पूजन करनेवाले यानी अपनी कृतकृत्यता माननेवाले राम आदि लोग शान्तपवनवाले मेव की तरह सौम्यता को प्राप्त हो गये तब साधुवाद का श्रवण कर रहे मुनिश्रेष्ठ भगवान्‌ वसिष्ठजी ने मधुरवचनपूर्वक विश्वामित्रजी से कहा : गाधिजी के कुल में यशरूपी सौरभ उत्पन्न करनेवाले कमलरूप हे मुनिवर, हे वामदेव, हे निमिजी, हे क्रतुजी, हे भरद्वाज, हे पुलस्त्य, हे अत्रे, हे घृष्टे, हे नारद, हे शाण्डिली, हे भास, भृगु, हे भारण्ड, हे वत्सवात्स्यायन आदि ऋषि लोगों, आप लोगों ने मेरा जो यह तुच्छ वचन सुना है जो बात इसमें छूट गई हो, जो अनुचित हो, निरर्थक हो, दुष्टार्थ हो वह आप इस समय शिष्यरहित मुझ पर अनुग्रह कर कृपया कहें