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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अहो बत महापुण्यं पदमासादितं त्वया । अनादिमध्यपर्यन्तमिदं यत्र न शोच्यते ॥ ३१ ॥ सम्यक्समसमाभोगे शीतले स्वात्मनि स्वयम् । नभसीव नभः शान्ते विश्रान्तिमसि लब्धवान् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे गुरुवर, यद्यपि इस प्रकार के निरतिशय परम पुरुषार्थ को प्रदान करनेवाले पूजनीय आपके पूजनयोम्य कोई महावस्तु न तो पृथिवीतल में मनुष्यों के पास है ओर न स्वर्ग में देवताओं के पास है अथवा न पाताल में नाग लोगों के पास ही है तथापि मैं अपना अवश्य कर्तव्यरूप इस शास्त्र तथा लोक में प्रसिद्ध गुरुपूजाक्रम को सफल बनाने के लिए समयानुसार कुछ प्रार्थना करता हूँ कृपया आप नाराज न हों